मनीगाछी दरभंगा के उमेश महतो का असामयिक निधन हो गया है।महतो के असामयिक निधन पर टोला सेवक के प्रदेश अध्यक्ष ब्रह्मा नन्द, सीतामढ़ी के मोहम्मद कमरे आलम और मधुबनी रहिका प्रखंड अध्यक्ष
सीताराम महतो ने गहरा शोक संवेदना व्यक्त किया है।
मंगलवार, 9 मई 2017
मनीगाछी दरभंगा के टोला सेवक उमेश महतो का असामयिक निधन
शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017
30 मई को होगी प्रदेश तालिमी मरकज़ की बैठक
बिहार राज तालीमी मरकज संघ ।आप तमाम साथी को सलाम अर्ज़ है आप लोगों को मालूम है की संघ ने अपनी ताकत के मुताबिक हमेशा काम किया है चाहे सब का साथ मिले या न मिले और हत्ता इमकान कामयाबी भी मिली है बस आप लोगों के हेल्प की आवासेयाक्ता है है आप के खुद के लिये आगामी कार्यकरम को देखते हुए संघ ने एक बैठक करने का निर्णय लिया है इस में सभी जिला के prisedent और परदेश कमिटी के सभी मेंबर मौजूद रहेंगें इस बैठक में आप सभी लोग सामिल हो कर अपनी जिम्मेदारी को निभाए यह बैठक । मोतिहारी के बेतिया में होगी होटल सिम्रेखा में आप सभी साथी को 29/04/2017 को पहुंचना है उस के अगले दिन यानि 30/04/2017 को सुबह से बैठक का दौर चलेगा वहां संघ के दुआरा रहने खाने का इन्तिजाम जिला कमिटी करेगी एजेंडा 1 संघ का पंजीयन 2 अगले माह हरताल या धरना का प्रोग्राम 3 संघ की मजबूती 4 सभी जिला का समस्या 5 समायोजन 6 पटना में अधिवेसन की तिथि etc आप सब से निवेदन है इस बैठक में जरुर आए और एक मजबूत कदम उठाने में आप सह्युग करें किसी भी तरह की जानकारी के लए कॉल/9534364390तारिक अनवर/9931495786अहमद राजा /8969861414/वकील अहमद
शुक्रवार, 3 मार्च 2017
नो कॉमेंट/नो कॉमेंट/नो कॉमेंट -
हमारे तालिमी मरकज़ के साथी आपस में ही उलझ कर अपनी तवानाई बर्बाद कर रहे हैं।रियासती तालिमी कमिटी पर कॉमेंट करना बन्द करें और मुस्तक़बिल के लाहे अमल पर ग़ौर व फ़िक्र करना शुरू करें।मौजूदा रियासती कमिटी का वजूद बेगूसराय सम्मलेन में अमल में आया है जो बहुत ही अच्छी कोशिशों का नतीजा है लिहाज़ा कोई कॉमेंट नही होनी चाहिए।
एक बात और वाज़ेह कर देना चाहता हूँ कि तालिमी मरकज़ के साथी या वर्किंग कमिटी के ओहदेदारन टोला सेवक संघ के पदाधिकारियों पर अंगुश्त नुमाई करने से परहेज़ करें और संजीदगी की निशानी पेश करें।
मेरी बातों से यह यह नतीजा निकलने की कोशिश न की जाये कि मैं किसी का समर्थन या विरोध कर रहा हूँ।
" मुत्तहिद हो तो बदल डालों नज़ामे हकुमत ।
मुंतसिर हो तो कटो मरो शोर मचाते क्यों हो ।।
MD Qamre Alam Ekdandi parihar sitamarhi Bihar
रविवार, 26 फ़रवरी 2017
इन्साफ इंडिया के बैनर तले नवादा में 28 फ़रवरी को इन्साफ मार्च का आयोजन
हार के नवादा ज़िला के अकबरपुर थाना के फरहा गाँव में 17 साल की लड़की के साथ सामुहिक ब्लातकार के बाद उसकी हत्या की कोशिश की गई थी और सर पर धारदार हथियार से हमला के बाद गला काटने का प्रयास किया गया इस तरह के घटना की पूर्णावृति न हो और पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए इन्साफ इंडिया ने 28 फ़रवरी को इन्साफ मार्च का आयोजन किया है ।
शुक्रवार, 27 जनवरी 2017
अपनी समस्या हमें लिखें हम आप की आवाज़ बनेंगें
अपनी समस्या हमें लिखें हम आप की आवाज़ बनेंगें
आप जनों से अपील है कि अगर आप प्रताड़ित किये जा रहे हैं कोई आप पर ज़ुल्म करता है या आप की कोई समस्या है आप हमें लिखें हम आप की आवाज़ बनेंगें और इवान ए हुकूमत तक पहुंचाने की कोशिश करेंगें तो देर किस बात की लिख भेजें व्हाट्स एप्प नम्बर 9199320346 पर
एडमिन
26 जनवरी को यौम ए जम्हूरिया क्यों मनाया जाता है ?
गणतंत्र दिवस हर भारतवासियों के लिए बहुत मायने रखता है, जिसे हम बेहद ही उत्साह के साथ मनाते हैं। गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया था और भारत इस दिन पूर्ण गणतंत्र देश बना।
बेहद बड़ा है हमारा संविधान
वरिष्ठ अधिवक्ता दुर्गविजय सिंह भैये ने बताया कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 वर्ष, 11 महिना, 18 दिन लगे थे। भारतीय संविधान के वास्तुकार डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने विश्व के अनेक संविधानों के अच्छे लक्षणों को अपने संविधान में आत्मसात करने का प्रयास किया है। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतांत्रिक देश बन गया था। देश को गौरवशाली गणतंत्र राष्ट्र बनाने में जिन देशभक्तों ने अपना बलिदान दिया उन्हें 26 जनवरी के दिन याद किया जाता और उन्हें श्रद्धाजंलि दी जाती है।
कुछ महत्वपूर्ण जानकारी
अधिवक्ता दुर्गविजय सिंह भैये ने संविधान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य बताये।
1- 26 जनवरी 1950 को 10.18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया।
2- गणतंत्र दिवस की पहली परेड 1955 को दिल्ली के राजपथ पर हुई थी।
3- भारतीय संविधान की दो प्रत्तियां जो हिन्दी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गई।
4- पूर्ण स्वराज दिवस (26 जनवरी 1930) को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान 26 जनवरी को लागू किया गया था।
5- भारतीय संविधान की हाथ से लिखी मूल प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में सुरक्षित रखी हुई हैं।
6- भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने गवर्नमैंट हाऊस में 26 जनवरी 1950 को शपथ ली थी।
7- गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं और हर साल 21 तोपों की सलामी दी जाती है।
8- 29 जनवरी को विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन किया जाता है जिसमें भारतीय सेना, 9 वायुसेना और नौसेना के बैंड हिस्सा लेते हैं। यह दिन गणतंत्र दिवस के समारोह के समापन के रूप में मनाया जाता है।
9- गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री अमर ज्योति पर शहीदों को श्रद्धाजंलि देते हैं जिन्होंने देश के आजादी में बलिदान दिया।
शुक्रवार, 20 जनवरी 2017
ऐ बादल बता तेरा मज़हब कौन सा है - गुलज़ार
मंदिर पे भी बरसता है..
ए बादल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।
इमाम की तू प्यास बुझाए
पुजारी की भी तृष्णा मिटाए..
ए पानी बता तेरा मजहब कोन सा है.... ।।
मज़ारो की शान बढाता है
मुर्तीयों को भी सजाता है..
ए फूल बता तेरा मजहब कौनसा है........।।
सारे जहाँ को रोशन करता है
सृष्टी को उजाला देता है..
ए सुरज बता तेरा मजहब कौनसा है.........।।
मुस्लिम तूझ पे कब्र बनाता है
हिंदू आखिर तूझ में ही विलीन होता है..
ए मिट्टी बता तेरा मजहब कौनसा है......।।
ऐ दोस्त मजहब से दूर हटकर, इंसान बनो
क्योंकि इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता.।।
गुलज़ार
सोमवार, 9 जनवरी 2017
इस्लाम में औरत का मक़ाम
जब बेटी पैदा होती है तो बाप के लिए जन्नत का दरवाज़ा खुलवाती है।
जब बीबी बनती है तो अपने शौहर का आधा दीन मुकम्मल करवाती है।
और जब माँ के दर्जे पर फ़ाइज़ होती है तो जन्नत उसके क़दमों तले रख दी जाती है।
इस्लाम में औरतों के मक़ाम और शिक्षा के प्रसार में महिलाएं इस्लाम के भूमिका का अंदाज़ा इस से लगाया जा सकता है कि दुनिया की पहली यूनिवर्सिटी 859 में मुराक्स के शहर वावोस में जामिया alqaraweyen में स्थापित की गई थी उसकी फाउंडर और हेड एक मुस्लिम महिला फातिमा अल फहरी थी जिस के पिता मोहम्मद अल फहरी एक दौलत मन्द ताजिर थे।इस लिए ये ख्याल बिल्कुल ग़लत है कि इस्लाम औरतों के शिक्षा का विरोधी है।
बुधवार, 21 दिसंबर 2016
तालिमी मरकज और उत्थान केन्द्र के स्वयं सेवी को शिक्षक के पद पर समायोजित किया जाए - मो○कमरे आलम
2.विभाग सभी नियुक्त टोला सेवक/शिक्षा स्वयं सेवी को शानाख्ति कार्ड जारी करे।
3.सभी सरकारी छुट्टी के अलावा आकस्मिक अवकास, चिकित्सा अवकाश, विशेषा अवकाश,मेटरनिटी लीव अधिघोषित किया जाए
4.भविष्यनिधि का लाभ लागू करने के साथ 10 लाख रुपये का जीवन बीमा करवाया जाए
5.प्रत्येक सेंटर पर TLM, TLE की राशि बच्चों और प्रशिक्षु महिला के लिए अलग-अलग उपलब्ध कराई जाए।
5.सेवा शर्त, नियमावली का निर्धारण किया जाए ।
6.सेवा पुस्तिका का निर्धारण किया जाए ।
7.मृत्यु उपरांत आश्रितों को अनुकम्पा का लाभ दिया जाए ।
8.जन शिक्षा निदेशालय द्वारा छोड़ दिए गए सभी पूर्व तालिमी मरकज शिक्षा स्वयं सेबी और टोला सेवक को अक्षर आॅचल योजना से जोड़ा जाए ।
9.बिहार के प्राथमिक विद्यालयों में Pre-Primary Education प्रारंभ कर शिक्षा स्वयं सेवी और टोला सेवक को शिक्षक के रूप में समायोजित किया जाए ।
10.नेशनल पेंशन स्कीम के तहत पेंशन की सुविधा के साथ स्वास्थ्य बीमा योजना से आच्छादित किया जाए ।
11.लम्बित मानदेय का भुगतान अविलंब किया जाए ।
रविवार, 18 दिसंबर 2016
पैसे की कमी, इलाज के अभाव में टोला सेवक की अकाल मृत्यु
संजय सुमन रा0 उ0 म0 विद्यालय जनदाहा प्रखंड शिवाजीनगर जिला समस्तीपुर मे कार्यरत टोला सेवक का आज पैसे के अभाव मे ईलाज के कारण निधन हो गया है।जिला संघ के द्वारा उनके आत्मा के शांति के लिए 2 मिनट का मौन धारण रखा और तत्काल 11000 रूपये उनके परिजन को देने का निर्णय लिया गया है ।जिलाध्यक्ष अनिल कुमार महतो समस्तीपुर ने संजय की अकाल मृत्यु पर गहरी संवेदना व्यक्त किया है।
गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016
तालीमी मरकज़ के शिक्षा स्वयं सेवक को सवैतनिक दो वर्षीय प्रशिक्षण दिया जाए-मोहम्मद कमरे आलम
1.शिक्षा स्वयं सेवी को मानदेय नही नियत वेतन कम से कम@18000/ रुपया दिया जाए और साथ ही समय पर देने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाय।
2.शिक्षको की तरह वर्ष में 16 आकस्मिक अवकाश ,चिकित्सा अवकाश और महिला शिक्षा स्वयं सेवी को मातृत्व अवकाश और पुरुष को पितृत्तो अवकाश की सुविधा प्रदान की जाय।
3. सरकार टोला सेवक एंव तालिमी मरकज़ के लिए सेवा शर्त एवं नियमावली तैयार करें ,एंव सेवा पुस्तिका का संधारण किया जाय ।
4. नियोजित शिक्षकों की तरह सवैतनीक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान से दो वर्षीय प्रशिक्षण दिलाया जाय।
5.उत्थान केंद्र और तालीमी मरकज़ को उस वक्त तक विद्यालय में ही संचालित किया जाए जब तक इन केंद्रों को विद्यालयों के रूप में स्थापित नहीं कर दिया जाता है क्योंकि किसी के दरवाज़े पर बीना संसाधन के संचालित किया जाना मुमकिन नहीं है ।
बुधवार, 19 अक्टूबर 2016
मुस्तकीम सिद्दीकी का पत्र रवीश कुमार(एन डी टीवी) के नाम
प्रिय रविश जी |
( यह हम जैसे आम आदमी का आक्रोश है , हमारे इस आक्रोश और क्रोध को न तो मीडिया दबा सकती है और न ही प्रशासन , सर मिन्हाज़ अंसारी की क्रूर हत्या एक ज्वाला बन कर उठ रही है , ऐसा ज्वाला जो देश में एक बदलाव ला सकती है , जो देश में एक क्रांती पैदा कर सकती ,जो देश में हलचल पैदा कर सकती है | सर हम आपको आपका पक्षपात बता रहे हैं , सर हम आपको आपकी हिंदुत्व एजेंडा को उजागर कर रहे हैं , सर हम आपका मुस्लिम विरोधी चरित्र उजागर कर रहे है | और यह सब इसलिए कर रहे हैं के आप रोहित विमुला की हत्या को हत्या मानते हैं , गुजरात में दलितों की पिटाई को अत्याचार मानते हैं , दिल्ली की सड़कों पर बलात्कार को बलात्कार मानते हैं लेकिन जब यही घटना मुसलामानों के साथ होता है तब आप के स्क्रीन की छमता या तो घट जाती है या फिर आप अपने ध्रुव पर आ जाते हैं | )
रविश सर जी कल मैंने आपके मोबाइल नंबर पर शाम लगभग 6 बजे कॉल किया था , आपने कॉल रिसीव नही की , यह सोंचकर के किसी आम आदमी का कॉल होगा या यह सोंच कर के कोई आम बात होगी , सर दोनों बातें सत्य है , मैं एक आम आदमी हूँ और बातें जो करनी थी वह भी आम थी | सर आम आदमी इसलिए के आप मुझे नहीं जानते हैं और इसलिए भी के आप के जानने वाले भी मुझे नही जानते | सर बातें आम इसलिए थी के एक २२ वर्षीय मुस्लिम लड़का मिन्हाज़ अंसारी को झारखण्ड की पुलिस अपने सरकार के चहितों की मदद से थाने में बहुत ही क्रूरता एवं दरिंदगी से पिट पिट कर जान मार देता है और आम इसलिए भी के गौरक्षों को खुश करने के लिए मारा जाता है और मुस्लिमों को भयभीत करने के लिए भी | सर थाने में क्रूरता एवं दरिंदगी से पिट पिट कर जान मारने को मैं आम बात इस लिए कह रहा हूँ के मुसलमानों को इस तरह मारना हमारे देश में आम बात हो चुकी है | सर जी हमने गौरक्षों जैसा शब्द का प्रयोग क्रोध में आकर किया है चुनके होस व् हवास में हम इसे गौआतंकी कहते हैं | क्रोध में कुछ बातें गलती से निकल जाती है और सुनने वाला समझ जाता है के यह बात गुस्से में बोली जा रही है | दुसरी बातें इस पत्र में, मैं की जगह हम शब्द का प्रयोग करने का अर्थ यह है के सिर्फ मैं नही चाहता बलके देश का हर शांती पसंद व्यक्ती मेरी तरह चाहता है |
अब आपसे मैं कुछ कहना चाहता हूँ , आप से एक आग्रह करना चाहता हूँ उम्मीद है के आप हमारी बातों को ध्यान से सुनेगें , और हम जैसे आम आदमी की खाहिश भी पुरी करेंगे , सर आप नही भी करेंगे तो हम कुछ नही कर सकते बस आपसे एक उमीद थी के आप करेंगें | आपसे उमीद करने के कुछ ख़ास कारण है चुनके आपसे हमारा एक रिश्ता है , आपसे हमारा एक संबंध है यह जरुरी नहीं के खून का रिश्ता ही एक रिश्ता होता है और यह भी जरुरी नहीं है के निजी संबंध से ही एक संबंध होता है | और हाँ अब बात खून पर आ चुकी है तो मैं चाहता हूँ के एक दिन के लिए आप अपना प्राइम टाइम वाला टीवी स्क्रीन रेड कर दें , सर उसी तरह जैसे आपने एक दिन ब्लैक किया था | सर फर्क सिर्फ इतना हो के जब आपने स्क्रीन ब्लैक किया था तो रंग से ब्लैक हुआ था, लेकिन जब रेड करें तो खून से , खून मैं अपना और अपने बेटे का देने को तैयार हूँ | सर अपना और अपने बेटे का इसलिए के अखलाक और मिन्हाज़ का खून मैं नही दे सकता चुनके अखलाक और मिन्हाज़ का खून मैं नही ला सकता | सर अखलाक और मिन्हाज़ के नाम पर आपको मेरी तरह करोड़ों लोग भी खून देने को तैयार हो जायेंगे, आपकी टीवी स्क्रीन खून से लाल हो जायेगी , सर इससे आपका कुछ नुक्सान नही होगा लेकिन हमारा फ़ायदा हो जाएगा इसलिए के आपने जब स्क्रीन ब्लैक किया था तो यह राष्ट्रीय घटना की तरह देखा गया था और आम लोगों पर अच्छा ख़ासा असर पडा था , सर जब आप खून से रेड करेंगे तो आपके स्क्रीन पर खून जम जाएगा , मैं जानता हूँ के जिस दिन आपके टीवी स्क्रीन पर जमा हुआ खून देश देखेगा तो देश में कोई तीसरा अखलाक या दुसरा मिन्हाज़ जैसा घटना नही होगा |
सर हम यह भी जानते हैं के हमारी बातों पर आप अपने टीवी स्क्रीन को रेड नही करेंगे चुनके आपके कुछ प्रोटोकॉल भी होंगे , आप पर कुछ दबाव भी होंगे , आप पर कुछ अलग आदेश भी होंगे और सबसे बड़ी बात यह है के हम आम आदमी हैं , आम आदमी के साथ मुसलमान हैं और झारखण्ड में है जहाँ बीजेपी की सरकार हैं | अगर ऐसा है तो आप प्राइम टाइम वाला टीवी स्क्रीन को खून से रेड मत कीजिये बस प्राइम टाइम में इस पत्र को पढ़ ही दीजिये या इस पर एक खबर तो चला ही दीजिये | सर हम आपसे आख़री आग्रह यह करेंगे के अगर यह सब नही कर सकते हैं तो आप अपने पत्रकार को २२ अक्टूबर को जामताड़ा ही भेज दीजिये , उस दिन आप चाहे तो लाइव भी देख सकते हैं के लोगों में कितना आक्रोश है , लोगों में कितना क्रोध है , लोगों में कितना गम है | आप खुद जान जायेंगे के यह लोग कौन हैं जिसमे आक्रोश है , इतना क्रोध है और गम भी , यह लोग सिर्फ मुसलमान नही हैं , इसमें आधे से अधिक आपको हिन्दू मिलेंगे, सर इसको कोई पकड़ कर नही ला रहा है , इसे कोई पैसे देकर नही ला रहा है , इसे कोई लालच देकर नही ला रहा है , इसे कोई डरा और धमका कर भी नही ला रहा है |
यह आक्रोश , क्रोध और गम सिर्फ इसलिए नही है के एक मुसलमान मरा , इस आक्रोश के कई कारन है , पहला सबसे बड़ा कारन मोबाइल पर गौमांस का फोटो रखने पर एक २२ वर्ष के लड़के को क्रूरता , दरिंदगी एवं अमानवीय तरीके से पिट पिट कर थाने में जान मार दिया जाता है , दुसरा मुख्य कारण थाने में पिट पिट कर पुलिस और आरएसएस के कार्यकर्त्ता मिल कर मारते हैं , तीसरा मुख्य कारण हत्यारे पुलिस और आरएसएस कार्यकर्ता या किसी पर भी हत्या का केस दर्ज नहीं किया जाता है , चौथा मुख्य कारण पुलिस पोस्ट मोर्टम रिपोर्ट से छेड़ छाड़ का प्रयास करती है , पांचवा मुख्य कारन पुलिस द्वारा क्रूरता , दरिंदगी एवं अमानवीय तरीके से पिट पिट कर जान मारने पर कोई प्राइम टाइम पर डिबेट नही होता है , किसी न्यूज़ चैनल पर इसे एक दिन की भी कवरेज नही मिलती है , किसी टीवी चैनल पर इसकी एक्स्क्लुसिंभ रिपोर्टिंग नही होती है , सर हम यह चैनल वाली बात उस चैनल की तरफ इशारा कर रहे हैं जो सीना बोरा और इन्द्रनी मुख़र्जी के मामले में हफ़्तों तक डिबेट या एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग करती थी , यह कैसा मीडिया है , यह कैसा पत्रकारिता है , यह कैसा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है के इस अमानवीय घटना पर चुप , खामोश और मौन है ?
सर हमें पता है के आप अपने पत्रकार को भी कवरेज के लिए नही भेजेंगे , आप इस पर कोई एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग भी नही करेंगे , आप लाइव तो दूर की बात एक स्क्रॉलिंग में भी जगह नही देंगे चुनके आप इस मुद्दे पर गंभीर नही हैं , चुनके आप इसे एक गरीब की हत्या मानते हैं , चुनके आप इसे आम आदमी की हत्या मानते हैं , और आप लोगों को गरीब और आम आदमी की चिंता नही है , चुनके अब आप पत्रकारिता से ज्यादा व्यक्तित्व का ध्यान रखते हैं , आप इमानदारी से ज्यादा रसुख का ख्याल रखते हैं , आप पेशा से ज्यादा पैसा का ध्यान रखते हैं | आपको हमारी बाते चुभ रही होगी , हमारा अंदाज़ आपको टिस पहुंचा रही होगी , हमारा पत्र आपको दुखी कर रहा होगा लेकिन सर सच कह रहा हूँ अगर आप मिन्हाज़ अंसारी की गिरफ्तारी से पहले , गिरफ्तारी के बाद और हत्या से पहले और हत्या के बाद की तस्वीर देख लें ,तो आप विचलित हो जायेंगे , फिर आप आम और खास में फर्क नही करेंगे , फिर आप अपने आप को रोक नही पायेंगे |
सर यह हम जैसे आम आदमी का आक्रोश है , हमारे इस आक्रोश और क्रोध को न तो मीडिया दबा सकती है और न ही प्रशासन , सर मिन्हाज़ अंसारी की क्रूर हत्या एक ज्वाला बन कर उठ रही है , ऐसा ज्वाला जो देश में एक बदलाव ला सकती है , जो देश में एक क्रांती पैदा कर सकती ,जो देश में हलचल पैदा कर सकती है | सर हम आपको आपका पक्षपात बता रहे हैं , सर हम आपको आपकी हिंदुत्व एजेंडा को उजागर कर रहे हैं , सर हम आपका मुस्लिम विरोधी चरित्र उजागर कर रहे है | और यह सब इसलिए कर रहे हैं के आप रोहित विमुला की हत्या को हत्या मानते हैं , गुजरात में दलितों की पिटाई को अत्याचार मानते हैं , दिल्ली की सड़कों पर बलात्कार को बलात्कार मानते हैं लेकिन जब यही घटना मुसलामानों के साथ होता है तब आप के स्क्रीन की छमता या तो घट जाती है या फिर आप अपने ध्रुव पर आ जाते हैं |
सर मिन्हाज़ अंसारी की हत्या ने प्रशासन और मीडिया की मानवता की पोल खोल कर रख दी है , सर मानवता की थर्मामीटर ने मीडिया को उसकी छवी बता दी है , सर चौथा स्तंभ अपनी शक्ती खो चूका है और अब किसी के सहारे पर खड़ा हुआ है , एक समय था जब लोग मीडिया का सहारा चाहते थे लेकिन अब मीडिया किसी का सहारा चाहता है | सहारा पूंजीपतियों का , सहारा फासीवादियों का , सहारा एक ख़ास वर्ग का |
सर अब मैं आपको ज्यादा कष्ट नही दूंगा , सर अब मैं आपको ज्यादा परेशान नही करूँगा, सर अब मैं आपको अधिक तकलीफ नही दूंगा |
सर यह एक बिहारी का पत्र बिहारी के नाम है , यह एक मजलूम की तरफ से हक की आवाज़ उठाने वालों के नाम है , यह सत्य को दबाने वालों के विरुद्ध एक हुंकार है इस पत्र में मैंने आपकी आलोचना की है जो सत्य पर आधारित है , आलोचना करना हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार है | अत : अंत में केवल इतना ही कहना है के आप हमारी आवाज़ को न दबाये |
धन्यवाद
मुस्तकीम सिद्दीकी ( Mustaqim Siddiqui )
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016
आवामी लोग-ज़ाती ज़िन्दगी
अज़ीज़ बरनी
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मैं खुश हूँ तो आप मेरे साथ हैं मैं ग़मज़दा हूँ तो आप मेरे साथ हैं ये निजी ख़त उनके नाम था जो मेरे अपने हैं या अपने बन सकते हैं।मेरे ज़िन्दगी के नदिबो फ़र्ज़ उनके सामने ना रखें वो मेरी ज़िंदगी के पेचों ख़म से नावाकिफ़ रहें मेरे दुःख दर्द का उन्हें इल्म ना मेरी खुशियों में शामिल नहीं फिर ये रिश्ता कैसा जो मैं इनके साथ क़ायम करने जा रहा हूँ उनका दर्द मेरा दर्द इनकी ख़ुशी मेरी ख़ुशी है।वो परेशान हों तो परेशान हैं वो ग़मज़दा हैं तो मैं अफ़सुर्दा हूँ।मेरा एक छोटा परिवार है जिस मे मैंने जन्म लिया उन्होंने फ़र्ज़ अदा किया और मैं एक नए परिवार का सरबराह बनाये ये भी मेरा छोटा परिवार है।जिसमे मेरी शरीके सफर औलादें हैं मैं कर चुका उनके लिए जो करना है और जो करना ज़रूरी है वो अभी करूँगा बेगम के लिए जिसमें मेरी पत्नी ओलादें हैं मैं कर चुका उनके लिए जो करना है और जो करना ज़रूरी है वो भी करूँगा बेगम के लिए अभी कुछ फ़र्ज़ मेरी क़ौम और मुल्क के तई, अभी कुछ साथ ऊपर जाना नही ये सिक्का वहाँ नही चलता सिर्फ आमलनामा चलता है वहाँ ये डर नही होता की आपने अपने मुतालिगीन को कितनी आराम वो आराइश की या शहाना ज़िन्दगी की फ़र्ज़ अदा किया कि नही अल्लाह की नेमत का जाएज़ इस्तेमाल किया या नाजायज़ ये मेरे आमालनामे मे डार्क होगा।कुछ लेकर गया नही था कुछ लेकर जाऊंगा नही जो रह गया उसका हिसाब तो मुझे ही देना है।अब वो मेरे आँख के आंसू हों तिजोरी मे चाँदी के टुकड़े में खुश हूँ या ग़मज़दा अगर हैसियत आवामी है तो मुझ से वाबस्ता हर मेरे जिस्म का हिस्सा नहीं।मेरी तहरीर के वारिस ये जहाँ खून पसीना बहाना परे और मेरे विरासत के अमीन ।वो जिनके पास मेरी तहरीक को ज़िंदा रखने का वक़्त ना हो अगर ऐसा हो तो अपने हक़ का ज़िम्मेदार ,व और मेरे हक़ की ज़िम्मेदार क़ौम ।क़ुरैश और अंसार के दरम्यान एक रिश्ता कायम किया था रसूलुल्लाह ने वो नज़ीर है क़ौम के लिए मैं तो उनका अदना सा ग़ुलाम सीरते रसूल से कुछ लिया और अपनी ज़िन्दगी में कुछ उतार लिया तो ये मेरी खुशनसीबी ।ख़तम हो जाने दीजिए मेरे पास जो है अपने वासएल से जो कर सकता हूँ फिर आगे आप के दरवाज़े पर, यक़ीन है आप मुझे नाउम्मीद न करेंगे।एक इंक़लाब बरपा करना है मुझे खाली बातों से नही होगा जान व माल हथेली पर रख कर चलना होगाजिस के पास जो ज़रूरियात के अलावा साथ लेकर चलना होगा और जिस के पास सिर्फ आँसू है खुदा की क़समवो चले अपने आँसू की सौग़ात लेकर मैं इस सरमाये से मैं उस की आँख में आँसू लाने वाले की दुनिया इन्हीं आँसुओं में ग़र्क़ कर दूँगा।
काम मुश्किल है मगर नामुमकिन नहीं ये तहरीर के लिए है।इलियास साहब रहबरी के लिए बराबर राब्ते में हैं।क़ौम के हवाले से बड़ा तजुर्बा है इनके पास,थोड़ा बहुत मैं भी जानता हूँ हम उस समय नाकाम हो जाते हैं जब उम्मीदें पलटती हैं मेरा काम है पैग़ाम ए हक़ देना, राहे खुदा में मज़्लूमीन के लिए जंग लड़ना इसका अजर तो खुदा देगा अब मैं मज़्लूमीन से ये मुतालबा भी करूँ की वो गुजरात दें मुझे सराहें।ये मेरा मुतालबा नही कोई एक काम का मुतालबा दो जगह से मांगता है क्या ? अब रहा सवाल नौजवान नस्ल को तहरीक से जोड़ने का तो ये फ़र्ज़ है मेरा, कि उनहोने आज़ाद हिंदुस्तान में आँखें खोलि हैं वो हमेशा आज़ाद फ़िज़ाओं में साँस लें और इनकी आने वाली नसलें भी ।मैं ज़रा सियासत को समझाता हूँ 70 साल पहले पाकिस्तान बंटा ताकि 100 साल तक पाकिस्तान से जंग की जा सके,दहशतगर्दी का तूफान खड़ा हो सके,मुसलमानों को हस्सासे गुनाह दिलाया जा सके, इनकी तरक़्क़ी के राह में कांटें बिछाई जा सके,उन्हें दो नम्बरी होने का अहसास दिलाया जा सके,अगर वक़्त रहते उन्हें आगाह कर दूँ तो बुरा क्या है अगर हालात पैदा न हुए तो खुशनसीबी इनकी और बदकिस्मती, इनकी राहों में कांटे बिछाए तो वो मायूस ना होंगे काँटों के दरमियान से राह बनाने के लिए ज़हनी तौर पर तैयार होंगे।क्या मिलेगा मुझे इस जीद्दोजेहत से क्या छीनेगा मुझ से इस जिद्दोजहद से मैं कोई कारोबारी हूँ क्या धंधा कर रहा हूँ जो फायदा नुकसान का हिसाब लगाओं,मैं कोईनेता हूँ जो वोट पाने की राह हमवार करूँ,किसी सियासी पार्टी का ग़ुलाम हूँ,क्या जो उसका हक़ नमक अदा करूँ आज़ाद सहाफी हूँ आज़ादी का मतलब बताने आया हूँ चार साल की नज़रबंदी का हिसाब चुकता करने आया हूँ चार बार मौत के मुँह से वापस लौट अब जिनदगी का हक़ अदा करने आया हूँ मुझे डराओ मत यारो जो मौत से ना डरा अब ज़िन्दगी से क्या से क्या डर ।
मेरे सामने मुखल्फीनका एक हजूम है और मैं तनहा इम्दादे इलाहीके सहारे अब्राह के हाथियों के लश्कर का सामना करने आया हूँ। तुम देख रहे हो मेरे साथ इन कम उम्र मासूम बच्चों को मैं इनमे वो अबाबिलों का लश्कर देखने आया हूँ जिनका ज़िक्र क़ुरान ए करीम की सूरा फील में है बस मैं इनकी चोंच में वो कंकरियां दबाने आया हूँ जो जो ज़ुल्म के रास्ते पर चलने वाले हस्तियों का लश्कर है मैं उसे इनके सहारे छुपे हुए भूसे में बदलने आया हूँ हाँ मैं अज़ीज़ बरनी हूँ हथेली पर सरसों बनाने आया हूँ जिन्होंने होश उड़ाये हमारे अब मैं इनके ठिकाने लगाने आया हूँ।
अज़ीज़ बरनी
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