Aziz Bundy
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एनजीओ / मीडिया हाऊस / मुसलमान और मुस्लिम मुख़ालिफ़ ज़हनियत
एनजीओ और मीडिया हाऊस पर जो कमेन्स्, पढ़ने को मिले वो बहुत हौसला अफ़्ज़ा हैं। रोड मैप से लेकर काम करने के जज़्बे तक बहुत कुछ सामने आया। सबसे पहले मैं बुनियादी ज़रूरतें आपके सामने रख दूं फिर आज तमाम नशेबो फ़राज़ को ज़हन में रख कर मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर लंबी गुफ़्तगु होगी और मैं ये भी वाज़ेह कर दूँ कि इस वक़्त जो कुछ फेसबुक या ट्विटर पर मैं लिख रहा हूँ और अमली तौर पर जद्दोजहद कर रहा हूँ और साथ ही आप सबके जो कमेन्स् सामने आ रहे हैं। मैं इन सबको यकजा करके एक किताब की शक्ल दे रहा हूँ लिहाज़ा आप भी जब कुछ लिखें तो ये सब ज़हन में रहे कि ये तमाम बातें तारीख़ के औराक़ में दर्ज हो रही हैं वो इसलिए कि जहां भी ये काम रुक जाय उसे आगे लेकर चलने वालों के ज़हन में आज की पेशरफ़्त और लोगों के तास्सुरात, अच्छे भी बुरे भी और तमाम लोगों की काविशें इन सबका नतीजा रिकार्ड में रहे। मेरी पहली ज़रूरत 1. वेब डिज़ाइनर 2. टेक्निकल एक्सपर्ट जो मेरे राइट अप (मज़ामीन) को तर्जुमा कर के सोशल नेटवर्किंग साईट्स और बल्क एसएमएस (Bulk SMS) व ई-मेल्स पर बड़ी तादाद में सेंड(Send) कर सके। मैं जो कुछ हर रोज़ करंट अफेयर्ज़ (Current Affairs हालाते हाज़रा) पर बोल रहा हूँ उसे यू-टयूब (YouTube) पर अपलोड (Upload) कर सके। 3. कोआर्डीनेटर जो ऐसे तमाम अफ़राद से राबता क़ायम कर सके जो फेसबुक या नेट पर नहीं हैं। ऐसे 3 / 4 लोग जो अपनी ज़िंदगी को इस मिशन के लिए वक़्फ़ कर सकें। जो इन कामों को करने की भरपूर सलाहियत रखते हों और 24 घंटे मेरे साथ रह सकते हों, मैं जहां भी हूँ अपने घर पर या सफ़र में साथ रहें या अपने तमाम अख़राजात ख़ुद उठा सकते हों या क़ौम उनकी ख़िदमात के लिए उनकी और उनकी फ़ैमिली की तमाम ज़िम्मेदारियां बहुत बेहतर अंदाज़ में क़ुबूल कर सकें, तो हम 24घंटे का ऐसा लाइव मीडिया (Live media) दे सकते हैं जो अभी लोगों के तसव्वुर से बहुत दूर है। उसे शुरू करने के लिए जितनी ज़रूरी रक़म की ज़रूरत होगी यानी कैमरा, कम्प्यूटर, एडीटिंग सिस्टम, मिनी स्टूडियो, इंटरनेट वग़ैरा ये सब मैं ख़ुद करूंगा, अल्लाह का करम है उतना मैं ख़ुद कर सकता हूँ पर इससे आगे हर घर तक पहुंचाने के लिए जो भी करना पड़े वो क़ौम को करना होगा और इस मुहिम में लाखों लोगों को जुड़ना होगा। तमाम मन्फ़ी पहलूओं को सामने रखना होगा।
आज मैं कुछ बातें आपके सामने रख रहा हूँ ताकि मुख़ालिफ़ हालात के लिए आप जाने अनजाने उन लोगों को ज़िम्मेदार ना मान लें जो सीधे इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। बेशक मैं जानता हूँ उन लोगों को जो क़ौम की तर्जुमानी किसी भी मीडिया या फ़र्द के ज़रिया नहीं चाहते, ग़ैरों पर शक मत कीजिए, जिस दिन सारी हक़ीक़त सुबूतों के साथ आपके सामने रख दूंगा आप के पैरों के नीचे से ज़मीन निकल जाएगी। बेशक मुख़ालिफ़ों में ग़ैर भी शामिल हैं पर ज़्यादा ख़तरा अपनों से है। इस वक़्त इसलिए ये लिख रहा हूँ कि जो 3 / 4 लोग पूरी तरह मेरी साथ जुड़ें वो ये सोच कर जुड़ें कि हर पल जान हथेली पर लेकर चलना है। बात सिर्फ ये नहीं के 24 घंटे काम करने के बाद भी कुछ नहीं मिलना है बल्कि हर पल ख़तरे के साथ ज़हनी तनाव के साथ अपनों के दबाव के साथ जीना है, मगर भरपूर तवज्जो के साथ हर पल अपने काम (मिशन) में जुटे रहना है, यूं समझो कि सर पर कफ़न बांध कर मैदाने जंग में उतरना है, अब जंग सिर्फ़ हथियारों से नहीं लड़ी जाती। आज मीडिया जंग का बहुत बड़ा हथियार है। आप मुझे क़ौम से ऐसे सिर्फ़ 4 लोग दे दीजिए, मैं इन्शाअल्लाह बड़ी से बड़ी मुख़ालिफ़ ताक़तों को नाकाम बना कर दिखा दूंगा।
हिंदुस्तान में मुसलमानों की आबादी तक़रीबन20 करोड़ है, मुसलमानों के नुमाइंदे ज़्यादा से ज़्यादा 200 । इनमें से 100 (सौ) सियासत में, चाहे वो सेंटर में मिनिस्टर हों, स्टेट में मिनिस्टर या अपनी सियासी हैसियत की वजह से, इसी तरह तक़रीबन सौ लोग अलग अलग मुस्लिम इदारों के सरबराह, मीडिया पर्सन्स, बड़े क़द के दानिश्वर, बिज़नस मैन या दीगर नुमाइंदा अफ़राद इन तक़रीबन 200 लोगों की लिस्ट आई बी (Intelligence Bureau), सीबीआई, होम मिनिस्ट्री ग़रज़ कि हिंदुस्तान की हुकूमत, अपोज़ीशन और उन सभी पार्टियों के पास होती है जो मुसलमानों के वोट पर सियासत करते हैं। इन 200 लोगों तक मुसलमान की रेसाई बहुत कम कभी कभी या जब वो चाहते हैं तभी होती है लेकिन ऊपर जिन सबका ज़िक्र किया, ये सब अपनी अपनी ज़रूरियात या ख़्वाहिशात के हिसाब से उनके राब्ते में रहते हैं चाहे सियासी ख़्वाब पूरा करना हो, माली या अपने क़द में इज़ाफ़ा के लिए, लिहाज़ा, ये ना किसी सरकार से बिगाड़ना चाहते हैं ना दूसरी सियासी ताक़तों से, कब कौन पावर में आ जाय, कब किस की ज़रूरत पड़ जाय, हुकूमतों के लिए उन्हें ख़्वाब दिखा कर फ़ायदा पहुंचा कर या नुक़्सान से डरा कर क़ाबू में रखना, कुछ भी मुश्किल नहीं होता, यही वजह है कि मुसलमानों के साथ हिंदुस्तान में चाहे जो सुलूक हो सरकारें उनसे बेखौफ रहती हैं ये या तो चुप रहते हैं या बस इतना बोलते हैं के मुसलमानों को लगे कि हाँ आवाज़ उठाई थी और सरकार बेफ़िक्र रहे कि बस चेहरा बचाने की कोशिश है। इतना तो उन्हें करना ही चाहिए ताकि कल वोट दिलाने के काम आ सकें। उर्दू सहारा के एडिटर अज़ीज़ बर्नी का क़ुसूर ये था कि वो गुजरात में बीजेपी के ख़िलाफ़ था, महाराष्ट्र में शिवसेना के, तो बटला हाऊस और गोपालगढ़ में कांग्रेस के, कल्याण सिंह से दोस्ती की बिना पर अपने 2 2 साल पुराने दोस्त मुलायम सिंह से लड़ बैठा, दहशतगर्दी के सवाल पर आरएसएस को बेनकाब कर दिया तो मुस्लिम नुमाइंदों से उनकी ख़ामोशी पर जवाब तलब करने लगा, सहारा उर्दू की ताक़त इतनी थी कि कोई भी नज़रअंदाज करने की हिम्मत नहीं कर सकता था, यही वजह थी कि सब के लिए इस आवाज़ को ख़त्म करना ज़रूरी था। लिहाज़ा, ऐसा रास्ता निकाला जाय जो सब को सूट करता हो यानी, अज़ीज़ बर्नी तो ज़िंदा रहे और उसके क़लम की मौत हो जाय। सहारा उर्दू तो ज़िंदा रहे लेकिन तहरीक दम तोड़ जाय, सब एक साथ एक राय हों तो मुश्किल क्या, लिहाज़ा, ये हो गया, एक तवील दास्तां की हल्की सी झलक आपके सामने इसलिए कि आपकी बेपनाह मोहब्बत भरे जज़्बात को देख रहा हूँ जो हर क़ुर्बानी पर आमादा हैं करोड़ों रुपया इकट्ठा कर के क़दमों में डाल देना चाहते हैं वो पहले इस सच्चाई को समझ लें कि करोड़ों रुपया इकट्ठा करने से ज़्यादा ज़रूरी है ये सच करोड़ों लोगों तक पहुंचा देना, पैसा जमा किया जा सकता है, मीडिया हाऊस खड़ा किया जा सकता है, हिंदुस्तान में 200 से ज़्यादा उर्दू अख़बार हैं।
मेरे कई साथी अब अपने अपने अख़बार निकालते हैं, मैं 21 बरस पहले अपना अख़बार निकालता था, अगर ये तब कर सका तो आज क्या मुश्किल है। कोई मुश्किल नहीं अकेले दम भी एक उर्दू अख़बार निकाल सकता हूँ, आप पर भरोसा है। वो कामयाब भी होगा। लेकिन 21 बरस लगे सहारा उर्दू को इतनी बड़ी ताक़त बनाने में, कि क़ौम की नुमाइंदगी कर सके और 21 घंटे से कम लगे इस नुमाइंदगी को तहस नहस कर देने में, इस दरमियान सहारा इंडिया परिवार का 100 करोड़ रुपय से ज़्यादा ख़र्च हुआ, इस अख़बार को ताक़तवर बनाने में क़ौम को इसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए, मैं ख़ुद ज़िंदगी भर एहसानमंद रहूँगा, इस हक़ीक़त को सामने रख कर उगला क़दम उठाना होगा
रविवार, 2 अक्टूबर 2016
अजीज बर्नी की कलम से
शनिवार, 1 अक्टूबर 2016
एन.जी.ओ.- कितना ख़्वाब कितनी हक़ीक़त
अज़ीज़ बर्नी
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दुनिया में हर बड़े काम की शुरूआत एक ख़्वाब से होती है, फिर उसे हक़ीक़त में बदलने की कोशिश की जाती है, कोशिश कामयाब हो जाय तो एक तारीख़ बन जाती है, नाकाम हो जाय तो आने वाली नस्लों के लिए तजुर्बा। ये कोशिश कामयाब होगी या नाकाम मैं इससे ज़्यादा कोशिश को जारी रखने में दिलचस्पी रखता हूँ, अगर आप को याद हो तो मैंने 21 बरस पहले एक ख़्वाब देखा था, उर्दू सहाफ़त के ज़रिए क़ौम के मसाइल पर काम करने का, अख़बार को क़ौम की नुमाइंदगी और एक ताक़त बनाने का मेरा ये ख़्वाब हक़ीक़त में बदला या नहीं, आज़ादी के बाद क़ौम को ऐसा अख़बार मिला कि नहीं जो हुकूमतों पर असरअंदाज़ हो सके, ये आप सोचें, शायद किसी नतीजे पर पहुंचने में मदद मिले, फिर एक ख़्वाब देख रहा हूँ पूरा हुआ तो एक और नई तारीख़, क़ौम को मज़बूती, नई नस्ल के बेहतर मुस्तक़बिल की उम्मीद, पूरा ना हुआ तो भी सुकून एक और अच्छा काम करने की कोशिश की, अपने मुस्तकबिल की फ़िक्र नहीं, अल्लाह का बड़ा करम है, एक शानदार ज़िंदगी जी चुका और जी रहा हूँ, मौत को सामने देख कर जीता हूँ। अपने लिए ख़ानए काबा से कफ़न ख़रीद चुका हूँ। अपनी तदफ़ीन के लिए अपनी पसंद की ज़मीन ख़रीद चुका हूँ, जो कर चुका वो एक तारीख़ है, क़ौम ने जितनी इज़्ज़त और प्यार दिया ये बहुतों का ख़्वाब हो सकता है। सियासत में नहीं आना जो सियासत में हैं उन्हें क़ौम का मुस्तकबिल बनाने की कोशिश करते रहना है, इस फ़ेहरिस्त में जो नाम हैं वो सब मेरी पसंद के एतबार से नहीं, क़ौम की ज़रूरत के एतबार से हैं, जिन से ज़ाती तौर पर नज़रियाती इख़्तेलाफ़ रहा है उन के नाम भी हैं और भी हो सकते हैं जो नए नाम सामने रखे इनमें पापुलर फ्रंट के मौलाना अबु बकर के ज़रिए बेशक केरला और तमिलनाडू की शानदार नुमाइंदगी हो सकती है।
अभी तक मैंने उन लोगों से राबिता नहीं किया है शायद उन लोगों को मालूम भी ना हो, आज से ये सिलसिला शुरू करने जा रहा हूँ, फ़ोन पर भी वक़्त लेकर इन सब से मिलने की दरख़ास्त करके भी, रहा सवाल इन सब के मुत्तहिद होने का ये कोई बड़ा मसला नहीं होना चाहिए, बेशक अलग अलग प्लेटफार्म या सियासी पार्टी में हैं पर एक दूसरे के ख़िलाफ़ कहां हैं, मौलाना बुख़ारी साहब और अबु आसिम आज़मी मुलायम सिंह के साथ हैं। मौलाना महमूद मदनी, मौलाना बदर उद्दीन अजमल अलग अलग पार्टी में सही पर आपस में भी अच्छे रिश्ते हैं और कांग्रेस से भी। ज़फ़र अली नक़वी, मौसम नूर, आफ़ताब एमएलए और ज़ाहिदा बेगम एमएलए कांग्रेस से ही हैं, रहमान शरीफ़ भी कांग्रेस फ़ैमिली से हैं सिर्फ डाक्टर अय्यूब अंसारी एक अलग पार्टी के हैं, पर उनका कोई नुमाइंदा पार्लियमेंट में नहीं है, इसलिए उनका स्टैंड (Stand) क्या होगा नहीं मालूम पर रहेंगे तो सेकुलर इत्तेहाद के साथ ही। असद उद्दीन ओवैसी इत्तेहादुल मुस्लिमीन के लीडर हैं पर हैं तो कांग्रेस के साथ ही, इनके अलावा मैंने मुलायम सिंह और मायावाती का नाम लिया, आपस में एक दूसरे के ख़िलाफ़ हैं पर दोनों ही सरकार बचाने के लिए कांग्रेस के साथ हैं, दोनों को ही हमारा एहसानमंद होना चाहिए, जब जो ताक़तवर बना, सरकार बनाई, हमारे बल पर। अगर ये सब हमारी ताक़त का सहारा लेकर सरकार बचाने के लिए एक हो सकते हैं तो एक ऐसी सरकार बनाने के लिए एक प्लेटफार्म पर क्यों नहीं हो सकते जिस में हमारी भी हिस्सेदारी हो, हम बाहर से किसी सियासतदाँ को ला नहीं रहे हैं जो इस वक़्त भी उनके साथ हैं, हाँ बस फ़र्क़ इतना है कि आज अपनी और उनकी जरूरतों के लिए साथ हैं और कल हम उन्हें क़ौम की जरूरतों के लिए एक देखना चाहते हैं।
अब रहा सवाल इस बात का कौन साथ आयेंगे और कौन नहीं आयेंगे अगर आप मुंतशिर हैं तो कोई आप के साथ नहीं आयेंगे, लेकिन जब आप सब मुत्तहिद होंगे तो आप के साथ आना उनकी मजबूरी होगी, चाहे वो मुलायम सिंह हों या माया वती या कोई और, इनमें से कौन आप के वोट के बगै़र ताक़तवर हो सकता है, आप का वोट लेकर कांग्रेस के साथ जाना है तो हमारे बेगुनाह बच्चों को आज़ाद कराएं , सिर्फ अपने लिए हमारे वोट का सौदा ना करें, अगर कांग्रेस और बीजेपी को किनारे कर के सरकार बनाने का इरादा है तो आओ साथ हमारे, ये भी हमारे बगै़र नहीं हो सकता, हालात कांग्रेस का साथ लेकर या कांग्रेस को साथ दे कर ही पैदा होते हैं तो भी हम रुकावट कहां हैं बस हम तो ये चाहते हैं हमारा वोट लो अगर हमारे एजेंडे पर, हम ना मुस्लिम पार्टी बनाने की बात कर रहे हैं ना किसी की हिमायत या मुख़ालिफ़त की बात कर रहे हैं, आप लोग जो कर रहे हो, करो लेकिन हमें साथ लेकर करो, हमारे मसाएल के हल के साथ करो, जिसके भरोसे में हम आपको वोट देते हैं। ये क्या कि वोट हमारा राज तुम्हारा, हम मारे जाएं, तुम ज़िम्मेदार लेकिन ना तुम आँसू पोंछने आओ, ना इंसाफ़ दिलाने।
ऊपर नामों के हवालों में शुऐब इक़बाल का ज़िक्र नहीं था वो भी दिल्ली स्टेट के डिप्टी स्पीकर कांग्रेस की मदद से रहे हैं, हाँ यासीन मालिक की बात सब से अलग है। वो अभी तक सियासी नहीं हैं लेकिन कश्मीर के अवाम पर उनका गहरा असर है। वो आएं सियासत में, कहें अपनी बात पार्लियमेंट में, शायद मसले का हल निकलने की सूरत बने। इनके अलावा कुछ दीगर आईएएस, आईपीऐस और जज हज़रात के नाम भी सामने आए हैं। ये हमारा थिंक टैंक बनें, जब जो सियासत में आना चाहें उनका ख़ैर मक़दम हो या दीगर बड़े ओहदों पर इनकी तकर्रुरू हो, सब कुछ हो सकता है, अगर अपनी ताक़त पहचान लो और अगर बदक़िस्मती से बड़े लोगों की मजबूरियां उन्हें मुत्तहिद ना होने दें तो क़ौम मुत्तहिद होने के लिए तैय्यार रहे, कुछ और सोचा जाएगा, अगर बहुत मजबूरी हुई, मैं जानता हूँ इस वक़्त ये बातें अख़बार में नहीं लिख पा रहा हूँ इसलिए बड़े दायरे में नहीं पहुंच पा रही हैं लेकिन ये कमी आप पूरी कर सकते हैं। आपकी तजवीज़ मौलाना अरशद मदनी साहब के लिए भी है जिस पर तब्सिरा अभी नहीं लेकिन जमीयत उल्माए हिंद के तमाम अफ़राद का तआवुन दरकार है चाहे उनका ताल्लुक किसी भी ग्रुप से क्यों न हो, अभी मौलाना अरशद मदनी साहब के बारे में कुछ भी लिखना या कहना नहीं चाहता, वक्त आने पर सब कुछ आपके सामने रख दूँगा, फिर जो भी आपका फैसला होगा सर आँखों पर...........
Virasat
AZIZ BURNEY
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Rishtey khoon k,sukoon k,junoon k
Ji han aaj m aap k darwaze par ek naye rishtey ka paigham lekar aaya hun ji nahi ye us rishtey ka paigham nahin h Jo do afraid ya do khandanon k darmyan hota h
M us rishtey ka paigham lekar aaya hun Jo poori Qom aur tamam ham khyal logon k darmyan ho
Hamara ek chota pariwar WO pariwar hota h jin se hamara khoon ka rishta hota h Jo hamare khoon se paida hain ya ham jin k khoon se paida hain
Hamara ek barha pariwar WO pariwar ho sakta h jinse hamara sukoon ka rishta h jinhen ham khud qayam karte hain jinse hamara dil ka rishta h Jo hamare hamkhyal hain moonh bole aur god liye rishtey bhi isi dayre m aate hain inki tadad LA mehmood ho sakti h
Jin se aapka khoon ka rishta h WO aapki khandani virasat k haqdar hain aur jinse aapka sukoon w junoon ka rishta h WO aapki amli virasat k haqdar hain aaj meri virasat do hisson m bati h ek WO Jo mitti ki virasat h jise ek din mitti m mil Jana h WO zamin zaydat eint pathar k makanat Jo mitti k siwa kuch nahin
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Junoon ka rishta
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Mujhe aap sab k jawab ka bahut besabri k sath intzar rahega m bat khatm karne se qabl ye arz kar dena chahta hun k Maine aaj tak ki zindgi m UN sab k sath apne rishtey ko poori imandari se nibhaya h jinse mera khoon ka rishta nahin h aur inshallh aage bhi isi imandari aur mohabbat se nibhane k azm k sath aaj k is paigham ko tamam karta hun .
aapka
Aziz Burney
शुक्रवार, 30 सितंबर 2016
जन प्रतिनिधियों की बेहिसी की बोलती तस्वीर
परिहार (सीतामढी )। ये एकडंडी प्रधानमंत्री मंत्री सड़क योजना से बने पथ के ईदगाह के नजदीक की तस्वीर है ।मालूम हो कि इस पथ से मुखिया और प्रखणड प्रमुख का गुजर हमेशा होता है मगर बेहिसी इतनी के निदान की कोई कोशिश नही ।
गुरुवार, 29 सितंबर 2016
उन्मुखीकरण कार्यक्रम का आयोजन
सोमवार, 26 सितंबर 2016
बिहार की शिक्षा को बर्बाद करने में किस का हाथ ?
बिहार की शिक्षा को बर्बाद करने में किस का हाथ है ? इस विषय पर अवश्य चर्चा वाद-विवाद होनी चाहिए जब देश प्रदेश का शिक्षाविद बुद्धिजीवी वर्ग वाद विवाद करना छोड़ देता है तो ह्रास होना शुरू हो जाता है यही हालात आज बिहार में शिक्षा का हो गया है बुद्धिजीवियों के खामोशी ने बिहार मे शिक्षा को नित्य नये प्रयोग की सामग्री बना शिक्षा को बर्बाद किया जा रहा है।
बिहार की 80 प्रतिशत आबादी शिक्षा के मामलों में सरकारी स्कूलों पर निर्भर करती है और सरकार का नित्य नया नया प्रयोग यहीं होता है क्योंकि मध्यम वर्गीय और गरीबों के बच्चे यहीं पढ़ते हैं ।
ए आर रहमान ने मज़हब इस्लाम क्यों क़बुल किया ?
हम ईश्वर की शरण में आना चाहते थे !
इस्लाम कबूल करने का फैसला अचानक नहीं लिया गया। यह फैसला मेरा और मेरी मां दोनों का सामूहिक फैसला था। हम दोनों सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण में आना चाहते थे।
संगीतकार ए आर रहमान ने सन् 2006 में अपनी मां के साथ हज अदा किया था। हज पर गए रहमान से अरब न्यूज के सैयद फैसल अली ने बातचीत की। यहां पेश है उस वक्त सैयद फैसल अली की रहमान से हुई गुफ्तगू।
भारत के मशहूर संगीतकार ए आर रहमान किसी परिचय के मोहताज नहीं है।
तड़क-भड़क और शोहरत की चकाचौंध से दूर रहने वाले ए आर रहमान की जिंदगी ने एक नई करवट ली जब वे इस्लाम की आगोश में आए। रहमान कहते हैं-इस्लाम कबूल करने पर जिंदगी के प्रति मेरा नजरिया बदल गया।
भारतीय फिल्मी-दुनिया में लोग कामयाबी के लिए मुस्लिम होते हुए हिन्दू नाम रख लेते हैं, लेकिन मेरे मामले में इसका उलटा है यानी था मैं दिलीप कुमार और बन गया अल्लाह रक्खा रहमान। मुझे मुस्लिम होने पर फख्र है।
संगीत में मशगूल रहने वाले रहमान हज के दौरान मीना में दीनी माहौल से लबरेज थे। पांच घण्टे की मशक्कत के बाद अरब न्यूज ने उनसे मीना में मुलाकात की। मगरिब से इशा के बीच हुई इस गुफ्तगू में रहमान का व्यवहार दिलकश था। कभी मूर्तिपूजक रहे रहमान अब इस्लाम के बारे में एक विद्वान की तरह बात करते हैं।
दूसरी बार हज अदा करने आए रहमान इस बार अपनी मां को साथ लेकर आए। उन्होने मीना में अपने हर पल का इबादत के रूप में इस्तेमाल किया। वे अराफात और मदीना में भी इबादत में जुटे रहे और अपने अन्तर्मन को पाक-साफ किया। अपने हज के बारे में रहमान बताते हैं-अल्लाह ने हमारे लिए हज को आसान बना दिया। इस पाक जमीन पर गुजारे हर पल का इस्तेमाल मैंने अल्लाह की इबादत के लिए किया है।
रविवार, 25 सितंबर 2016
संवेदना का ह्रास
निचले तबक़े के आदमियों से दूर होती संवेदना बहुत चिंता का विषय है, दो तीन दिनों से झारखंड के एक सरकारी अस्पताल में, मरीज़ को फर्श पर भोजन परोसने जैसी संवेदनशील ख़बर, चर्चा में बहस का विषय है।
कौन कौन दोषी हो सकते हैं, इस घटना को अंजाम देने के लिए? सत्ता, पूंजीपति, व्यवस्था, अस्पताल की ऐडमिनिस्ट्रेटिव डिपार्टमेंट, इस घटना में सिर्फ आसमान में उड़ने वाले ही नहीं शामिल हैं, बल्कि ज़मीन से जुड़े लोग भी शामिल हैं, हम उन्हें अनदेखा कैसे कर सकते हैं? खाना परोसने वाला कोई पूंजीपति या राजनीतिज्ञ नहीं था, एक अदना सा कर्मचारी है, अस्पताल में डी ग्रेड कर्मचारियों की तनख़्वाह होती ही कितनी है, बुनियादी सुविधाओं को पूरा करने मात्र । मतलब कि अस्पताल में जिस व्यक्ति ने निर्मम घटना को अंजाम दिया, वो एक आम आदमी है। बहुत भयावह स्थिति है, एक आम आदमी के भीतर से संवेदना, जिम्मेदारी का नष्ट हो जाना। फिर कटघरे में सिर्फ सत्तापक्ष और पूंजीवादी व्यवस्था ही क्यों?
साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, अक्सर अपनी रचनाओं के माध्यम से, समाज के उच्चवर्गीय, मध्यवर्गीय लोगों में, संवेदनाओं के नष्ट होने की दुहाई देते रहते हैं, पूंजीपतियों और नेताओं के व्यवहार पर टिप्पणी करते रहते हैं, व्यवस्था का विरोध करते रहते हैं, आम आदमी की स्थितियों- प्रस्थितियों , मज़बूरीयों का वर्णन करते हैं, लेकिन आज आम आदमी की भी संवेदना नष्ट हो गई है, वो भी दोषियों की श्रेणी में खड़ा है, तो उसे कटघरे में क्यों नहीं खड़ा करना चाहिए?
इस घटना में अगर सत्ता, व्यवस्था, पूंजीपति, अस्पताल का ऐडमिनिस्ट्रेटिव, डिपार्टमेंट जितना दोषी है उतना ही दोषी वह आम आदमी कहलाने वाला कर्मचारी भी है। और कहीं न कहीं सोशल मीडिया और बिकी हुई मिडिया भी, जिसने तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर साझा की, सबसे बड़ा असंवेदनशील व्यक्ति तो वही है, जिसने तस्वीर खींच कर पूरे हिन्दुस्तान में संप्रेषित करने की जहमत की, लेकिन उस खाना परोसते हुए कर्मचारी का हाथ नहीं पकड़ा, उसके मुँह पर तमाचा नहीं मारा। इतनी ही संवेदना थी तो पहले उस मरीज़ को प्लेट में खाना मुहैया करवाता, अस्पताल वालों ने नहीं दिया तो, वही अपने केमरा चलाने से पहले, उस मरीज़ को सम्मान पूर्वक भोजन करा देता, उसके बाद मिडिया और सोशल मीडिया की रोटियां सेकने का इंतजाम करता।
मरीज़ कितना विवश था कि, उसने विरोध नहीं किया, खाना खा लिया फर्श से ही उठाकर। उसके परिवार वाले कहाँ थे? क्या वो घर से ज़रूरी वस्तुएं मरीज़ के लिए नहीं ला सकते थे? या फिर इस घटना का दूसरा पहलू यह है कि, वो मरीज़ अकेला ही था अस्पताल में भर्ती, और उसके परिवार के सदस्य उसके साथ अस्पताल में रहने के लिए असमर्थ होंगे, किन्हीं कारणों से। कैसी - कैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है एक ग़रीब आदमी को। जिसकी ओर सत्ता का ध्यान कभी केंद्रित नहीं होता, वर्तमान सत्ता से क़ितनी उम्मीदें थीं जनता को, लेकिन क्या हुआ, सरकार ने अपने वादे पूरे किये? यह छोटी-छोटी बुनियादी ज़रूरतें तो पूरी की नहीं, और मेहंगी दँवाईयों की सब्सिडी भी ख़त्म कर दी।
बुलेट ट्रेन का ही तोहफा मिलेगा क्या इन पाँच सालों में? शिक्षा- स्वास्थ्य, बेरोजगारी, प्रदूषण, ग़रीबी जैसी समस्याओं पर वर्तमान सरकार का ध्यान क्यों नहीं जाता है? बीफ, कश्मीर, पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुद्दे मिडिया में उछलते रहते हैं, सरकार न तो ग़रीब मज़दूर के बारे में सोच रही है, और न ही दलितों- मुसलमानों, स्त्रियों के बारे में कुछ कर रही है। फिर कौन खुश हैं, संतुष्ट हैं इस सरकार से। हक़ीक़त यह है कि न कोई खुश हैं, और न ही कोई सुरक्षित हैं।
पिछले साठ सालों में कॉग्रेस ने राज किया, उसने भी इस बुनियादी ढांचे में कोई सुधार नहीं किया, और आज विपक्ष में बैठकर चिल्ला रही है। और बीजेपी पिछले साठ सालों से विपक्ष में रहकर चिल्ला रही थी, आज सत्ता में है। यह हिन्दुस्तान की बहुत बदकिस्मती है कि, उसके पास बड़े राष्ट्रीय स्तर की दो पार्टियां हैं कॉग्रेस और बीजेपी, यही सत्तापक्ष और विपक्ष में रहती हैं, और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती रहती हैं। और तीसरा विकल्प मज़बूत नहीं होता।
-मेहजबीं
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मोहम्मद क़मरे आलम ने शिक्षा मंत्री ,प्रधान सचिव शिक्षा विभाग बिहार पटना को ईमेल संदेश भेज कर तालिमी मरकज और उत्थान केंद्र के स्वयं सेवी को...
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1.शिक्षा स्वयं सेवी को मानदेय नही नियत वेतन कम से कम@18000/ रुपया दिया जाए और साथ ही समय पर देने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाय। 2.शिक्षको क...
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अपनी समस्या हमें लिखें हम आप की आवाज़ बनेंगें आप जनों से अपील है कि अगर आप प्रताड़ित किये जा रहे हैं कोई आप पर ज़ुल्म करता है या आ...
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विशेष रिपोर्ट :- पाँच राज्यो के विधान सभा चुनाव के नतीजो की समीक्षा करते हुए माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं बी जे पी राष्ट्रीय अध्...
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सूरी समाज ने रालोसपा को किया समर्थन परिहार मे निर्वाचन हुआ दिलचस्प. परिहार में रालोसपा उम्मीदवार...
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बिहार की शिक्षा को बर्बाद करने में किस का हाथ है ? इस विषय पर अवश्य चर्चा वाद-विवाद होनी चाहिए जब देश प्रदेश का शिक्षाविद बुद्धिजीवी वर्ग वा...