अज़ीज़ बरनी
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मैं खुश हूँ तो आप मेरे साथ हैं मैं ग़मज़दा हूँ तो आप मेरे साथ हैं ये निजी ख़त उनके नाम था जो मेरे अपने हैं या अपने बन सकते हैं।मेरे ज़िन्दगी के नदिबो फ़र्ज़ उनके सामने ना रखें वो मेरी ज़िंदगी के पेचों ख़म से नावाकिफ़ रहें मेरे दुःख दर्द का उन्हें इल्म ना मेरी खुशियों में शामिल नहीं फिर ये रिश्ता कैसा जो मैं इनके साथ क़ायम करने जा रहा हूँ उनका दर्द मेरा दर्द इनकी ख़ुशी मेरी ख़ुशी है।वो परेशान हों तो परेशान हैं वो ग़मज़दा हैं तो मैं अफ़सुर्दा हूँ।मेरा एक छोटा परिवार है जिस मे मैंने जन्म लिया उन्होंने फ़र्ज़ अदा किया और मैं एक नए परिवार का सरबराह बनाये ये भी मेरा छोटा परिवार है।जिसमे मेरी शरीके सफर औलादें हैं मैं कर चुका उनके लिए जो करना है और जो करना ज़रूरी है वो अभी करूँगा बेगम के लिए जिसमें मेरी पत्नी ओलादें हैं मैं कर चुका उनके लिए जो करना है और जो करना ज़रूरी है वो भी करूँगा बेगम के लिए अभी कुछ फ़र्ज़ मेरी क़ौम और मुल्क के तई, अभी कुछ साथ ऊपर जाना नही ये सिक्का वहाँ नही चलता सिर्फ आमलनामा चलता है वहाँ ये डर नही होता की आपने अपने मुतालिगीन को कितनी आराम वो आराइश की या शहाना ज़िन्दगी की फ़र्ज़ अदा किया कि नही अल्लाह की नेमत का जाएज़ इस्तेमाल किया या नाजायज़ ये मेरे आमालनामे मे डार्क होगा।कुछ लेकर गया नही था कुछ लेकर जाऊंगा नही जो रह गया उसका हिसाब तो मुझे ही देना है।अब वो मेरे आँख के आंसू हों तिजोरी मे चाँदी के टुकड़े में खुश हूँ या ग़मज़दा अगर हैसियत आवामी है तो मुझ से वाबस्ता हर मेरे जिस्म का हिस्सा नहीं।मेरी तहरीर के वारिस ये जहाँ खून पसीना बहाना परे और मेरे विरासत के अमीन ।वो जिनके पास मेरी तहरीक को ज़िंदा रखने का वक़्त ना हो अगर ऐसा हो तो अपने हक़ का ज़िम्मेदार ,व और मेरे हक़ की ज़िम्मेदार क़ौम ।क़ुरैश और अंसार के दरम्यान एक रिश्ता कायम किया था रसूलुल्लाह ने वो नज़ीर है क़ौम के लिए मैं तो उनका अदना सा ग़ुलाम सीरते रसूल से कुछ लिया और अपनी ज़िन्दगी में कुछ उतार लिया तो ये मेरी खुशनसीबी ।ख़तम हो जाने दीजिए मेरे पास जो है अपने वासएल से जो कर सकता हूँ फिर आगे आप के दरवाज़े पर, यक़ीन है आप मुझे नाउम्मीद न करेंगे।एक इंक़लाब बरपा करना है मुझे खाली बातों से नही होगा जान व माल हथेली पर रख कर चलना होगाजिस के पास जो ज़रूरियात के अलावा साथ लेकर चलना होगा और जिस के पास सिर्फ आँसू है खुदा की क़समवो चले अपने आँसू की सौग़ात लेकर मैं इस सरमाये से मैं उस की आँख में आँसू लाने वाले की दुनिया इन्हीं आँसुओं में ग़र्क़ कर दूँगा।
काम मुश्किल है मगर नामुमकिन नहीं ये तहरीर के लिए है।इलियास साहब रहबरी के लिए बराबर राब्ते में हैं।क़ौम के हवाले से बड़ा तजुर्बा है इनके पास,थोड़ा बहुत मैं भी जानता हूँ हम उस समय नाकाम हो जाते हैं जब उम्मीदें पलटती हैं मेरा काम है पैग़ाम ए हक़ देना, राहे खुदा में मज़्लूमीन के लिए जंग लड़ना इसका अजर तो खुदा देगा अब मैं मज़्लूमीन से ये मुतालबा भी करूँ की वो गुजरात दें मुझे सराहें।ये मेरा मुतालबा नही कोई एक काम का मुतालबा दो जगह से मांगता है क्या ? अब रहा सवाल नौजवान नस्ल को तहरीक से जोड़ने का तो ये फ़र्ज़ है मेरा, कि उनहोने आज़ाद हिंदुस्तान में आँखें खोलि हैं वो हमेशा आज़ाद फ़िज़ाओं में साँस लें और इनकी आने वाली नसलें भी ।मैं ज़रा सियासत को समझाता हूँ 70 साल पहले पाकिस्तान बंटा ताकि 100 साल तक पाकिस्तान से जंग की जा सके,दहशतगर्दी का तूफान खड़ा हो सके,मुसलमानों को हस्सासे गुनाह दिलाया जा सके, इनकी तरक़्क़ी के राह में कांटें बिछाई जा सके,उन्हें दो नम्बरी होने का अहसास दिलाया जा सके,अगर वक़्त रहते उन्हें आगाह कर दूँ तो बुरा क्या है अगर हालात पैदा न हुए तो खुशनसीबी इनकी और बदकिस्मती, इनकी राहों में कांटे बिछाए तो वो मायूस ना होंगे काँटों के दरमियान से राह बनाने के लिए ज़हनी तौर पर तैयार होंगे।क्या मिलेगा मुझे इस जीद्दोजेहत से क्या छीनेगा मुझ से इस जिद्दोजहद से मैं कोई कारोबारी हूँ क्या धंधा कर रहा हूँ जो फायदा नुकसान का हिसाब लगाओं,मैं कोईनेता हूँ जो वोट पाने की राह हमवार करूँ,किसी सियासी पार्टी का ग़ुलाम हूँ,क्या जो उसका हक़ नमक अदा करूँ आज़ाद सहाफी हूँ आज़ादी का मतलब बताने आया हूँ चार साल की नज़रबंदी का हिसाब चुकता करने आया हूँ चार बार मौत के मुँह से वापस लौट अब जिनदगी का हक़ अदा करने आया हूँ मुझे डराओ मत यारो जो मौत से ना डरा अब ज़िन्दगी से क्या से क्या डर ।
मेरे सामने मुखल्फीनका एक हजूम है और मैं तनहा इम्दादे इलाहीके सहारे अब्राह के हाथियों के लश्कर का सामना करने आया हूँ। तुम देख रहे हो मेरे साथ इन कम उम्र मासूम बच्चों को मैं इनमे वो अबाबिलों का लश्कर देखने आया हूँ जिनका ज़िक्र क़ुरान ए करीम की सूरा फील में है बस मैं इनकी चोंच में वो कंकरियां दबाने आया हूँ जो जो ज़ुल्म के रास्ते पर चलने वाले हस्तियों का लश्कर है मैं उसे इनके सहारे छुपे हुए भूसे में बदलने आया हूँ हाँ मैं अज़ीज़ बरनी हूँ हथेली पर सरसों बनाने आया हूँ जिन्होंने होश उड़ाये हमारे अब मैं इनके ठिकाने लगाने आया हूँ।
अज़ीज़ बरनी
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016
आवामी लोग-ज़ाती ज़िन्दगी
गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016
AAP K SAWAL MERE JAWAB AUR FUTURE PLAN-Aziz Burey
m har sawal ka jawab de sakta hun par khuda k liye mujhse wo sawal mat poochiye jis k jawab se mere aur aap k apne benaqab ho jayn jinhone apni taqat aur paise k bal par mujhe tanhaiyon k andhere m bhej diya wo phir mujhe Aap se cheen sakte hain m khofzada nahin hun pichle tajurbat se kuch seekhkar aage barhna chahta hun KUCH KARNA CHAHTA HUN AISA JO PEHLE KABHI NAHIN HUA SOCIAL NETWORKING SITES KO AAP K LIYE QOM K LIYE DUNIA KA SABSE BARHA MEDIA CENTER BANANA CHAHTA HUN YE HO GAYA TO PHIR EK NAYI TAREEKH NA HUA TO YE SUKOON JATE JATE QOM K LIYE KUCH KARNE KI KOSHISH KI JO M NA KAR WO MERI NAYI TEAM KAREGI
han mujhe har pal aapka intzar h ek team member ki shakl m aapki mukhtasar jankari k sath nam pata pine no taleem kahan k rehne wale hain kya karte hain is ttehreek k liye kya kar sakte hain aaghaz k liye mujhe aap se sirf 2 chezen chahiye aapka waqt jitni ho saken kitaben chahe ghar ghar jakar hasil karna parhe roz mujhse interacton aaj kya kiya kal kya karna h
Kya karenge ye sab bat meri nahin m allah k karam se ek shandarzindgi ji chuka aur aaj bhi pareshan haal nahin hun sawal qom ka h sawal islam k tehffuz ka h sawal begunahon ko jail se cburhane ka h sawal asl mujrimon ko jail ki salkhon tak pahunchane ka h sawal har bum dhamakey k peeche chipa sach samne lane ka h sawal dehshatgardi aur siyasat ka rishta samjhane ka h sawal kashmir ko bachane ka h sawal apni maaon betiyon behnon ko tahffuz dilane ka h sawal apne nojawanon ko dehshatgardi k ilzam se bachane ka h
Kys aaynge aap mere sath mujhe aapse jaN maal nahin chahiye aapka waqt aur jazbai easar o qurbani chahiye kya denge aap agar han to nikaliye waqt aur mujhse rabta qayam kijye pehli fursad m
.era imla theek nahin h mera jumla theek nahin h mera lehja theek nahin h jane deejye in baton ko m dharkte dil aur knpti ungliyon se apne jazbat aap tak pahuncha raha hun agar meri tehreer aap k dil m utar jati h to mera maqsad kamysb agar nahin to qeemti adabi saheefa bhi nskam
M kisi adabi seminar m mozu e adab par guftgoo nahin kar raha hun m maidane jang se bol raha hun jahan meri nihatti qom ko apni baqa k samna h aise m apni tehreer m lafzon ki khoobsoorti laun ys un k tahffuz ki laheamal banaun is meri tawajjeh khud k numaya hone par nahin qom k numaya hone par h meri aabroo jati h to jay meri qom ki aabru bach jay meri jan jati h to jay meri qom ko tahffuz mil jay bas yahi aakhri khwahish h khuda hafiz aapka aziz burney
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016
मोदी और आर एस एस का छीपा एजेंडा
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मोदी और आर एस एस का कोई छीपा एजेंडा नही है हमारी नज़र कमज़ोर है या याददाश्त कमज़ोर है ये शुतुरमुर्ग की तरह रात में गर्दन छीपा कर हम खतरे को देखना नही चाहते।1901 में बनी हिंदू महासभा काँग्रेस आज़ादी की जंग लड़ रही थी मै सियासी पार्टी काँग्रेस की बात नहीं कर रहा हूँ मैं उस काँग्रेस की बात कर रहा हूँ जो आज़ादी की जंग का प्लेटफॉर्म था जिस में मोहम्मद अली जिन्ना भी थे सरदार पटेल भी पंडित नेहरू भी मौलाना आजाद भी और सर्ब्राही महात्मा गांधी की,जब हिन्दू मुसलमान साथ थे और कंधे से कन्धा मिला कर जंग लड़ रहे थे देश को आज़ादी की ज़रूरत थी ।हिन्दू महासभा को आज़ादी से ज़्यादा हिन्दू मुस्लमान का दो टुकड़ों मे बंट जाना पसंद था ये हिन्दू गर्दी नही तो क्या था उसी दौड़ में हिन्दू महासभा के जरिए कानपुर की एक मस्जिद की दीवार तोड़ी गई हिन्दू गर्दी नही तो क्या थी हाल ही में कानपुर में बजरंग दल के कार्यकर्ताबम बनाते हुए मारे गए ये हिन्दु गर्दी नही तो क्या था ।यही आर एस एस का एजेंडा था यही आर एस एस का एजेंडा है और यही आर एस एस का एजेंडा रहेगा इसमें क्या छिपा है इतिहास उठा कर देखो मैं जो जो लिख रहा हूँ ये इतिहास का आईना है तुम देखते क्यों नहीं तुम्हें फ़िक्र है आर एस एस का छिपा एजेंडा क्या, कोई छिपा एजेंडा नही है आर एस एस का सब कुछ खुली किताब की तरह ज़ाहिर है ।
बस हमारा कोई एजेंडा नही है न छिपा न खुला कौन है मोदी क्या मोदी का कोई छिपा एजेंडा है क्या गुजरात आप को याद नहीं क्या ये मोदी का छिपा एजेंडा था जिस पर अमेरिका ने visa कैंसिल किया वाजपेयी समेत सभी पार्टियों के नेताओं ने खेद प्रकट किया था उच्चतम न्यायालय ने नीरो तक ने कहा आज तक मोदी ने गुजरात पर माफ़ी नही मांगी क्या छिपा था इसमें टोपी आर एस एस का पोशाक का हिस्सा है लेकिन मोदी ने रस्मी तौर पर भी मुस्लिम टोपी लगाने से इंकार कर दिया ये छिपा एजेंडा है क्या कश्मीर में जो रहा है ये छिपा एजेंडा है क्या सर्जिकल ऑपरेशन में क्या हो रहा है सब लिख रहे हैं ये छिपा एजेंडा है क्या मुरादाबाद में, जयपुर में, आंध्रा में, अजमेर में, महाराष्ट्र में, कर्नाटका में, मुज़फ्फर नगर में जो क़त्ले आम हुआ ये छिपा एजेंडा है क्या, करकरे ने मालेगांव की तफ्तीश में आर एस एस का जो चेहरा सामने रखा वो किसी से छिपी है क्या।स्वामी असीमानंद ने मक्का मस्जिद बम विस्फोट, दरगाह अजमेर शरीफ धमाका,समझौता एक्सप्रेस विस्फोट और
Nahin nahin nahin
Sabkuch roze roshan ki tareh h kuch bhi chipa nahin h na kal na aaj na AANE WALE KAL KA MANSOOBA chipe hue hain shturmurg ban gaye hain gardan chipa li h hamne ret k andar kuch dekhna nahin chahte ham gumrahh kar rahe hain ham apni aane wali naslon ko ham unhen bstate kyon nahin k tum khud spna difa karo karne ka irada rakho zehni aur jismsni tor par in halat ka samna karne k liye tayyar raho hsm nakam ho chukey h tumhai hifazat m tumhen mara ja raha ma bap mmama mami k samne izzat looti ja rahi h mama mami ko qatl kiya ja raha h hamai zaban hakime waqt ki ghual h ham sadae haq bhi buland nahin kar sakte
Beete hue kal m vajpaee ne angrezon ki ghlami k parwane par dastkht kar diye the aaj hamne hakime waqt ki gulami k parwane par datkhat kar diye hain hamare jism ka libas hamari zahri shakhshiyat tumhari tumhari tarjumani karti h lekin hamari rooh hamari batni shakhshiyat aaqae waqt ki ghulami karti h ye h hsmars chipa agenda aur ye chipa rahe isliye ham rss k cipey agenge ki bat karte hain achchs kuch bat karte ham iski taeed kate hain par kya kafi h hhalst ka takaza h k hamen is se aagey barhna h aur hsm ishaalah barh kar rahenge ab hamara bhi agenda hoga chipa bhi kula bhi
Aur is agendey par kam jarii h social networking sites par open media jo sari haqeeqat samne rakhega siyasat aur dehshatgardi kya rishta h ye naqab karega haq aur insaf ki jang larhega Aur mera chipa agenda rss k chipe agendey ka jawab hoga zara intzar karo mujhe wapas lotne to do allah ne nayi zindgi di h to kuch naya aur bsrha kam bhi hoga---------
सोमवार, 10 अक्टूबर 2016
झारखण्ड में मरीजों को फर्श पर भोजन परोशने का ज़ेम्मेदार कौन ?
महज़बीं
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निचले तबक़े के आदमियों से दूर होती संवेदना बहुत चिंता का विषय है, दो तीन दिनों से झारखंड के एक सरकारी अस्पताल में, मरीज़ को फर्श पर भोजन परोसने जैसी संवेदनशील ख़बर, चर्चा में बहस का विषय है।
कौन कौन दोषी हो सकते हैं, इस घटना को अंजाम देने के लिए? सत्ता, पूंजीपति, व्यवस्था, अस्पताल की ऐडमिनिस्ट्रेटिव डिपार्टमेंट, इस घटना में सिर्फ आसमान में उड़ने वाले ही नहीं शामिल हैं, बल्कि ज़मीन से जुड़े लोग भी शामिल हैं, हम उन्हें अनदेखा कैसे कर सकते हैं? खाना परोसने वाला कोई पूंजीपति या राजनीतिज्ञ नहीं था, एक अदना सा कर्मचारी है, अस्पताल में डी ग्रेड कर्मचारियों की तनख़्वाह होती ही कितनी है, बुनियादी सुविधाओं को पूरा करने मात्र । मतलब कि अस्पताल में जिस व्यक्ति ने निर्मम घटना को अंजाम दिया, वो एक आम आदमी है। बहुत भयावह स्थिति है, एक आम आदमी के भीतर से संवेदना, जिम्मेदारी का नष्ट हो जाना। फिर कटघरे में सिर्फ सत्तापक्ष और पूंजीवादी व्यवस्था ही क्यों?
साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, अक्सर अपनी रचनाओं के माध्यम से, समाज के उच्चवर्गीय, मध्यवर्गीय लोगों में, संवेदनाओं के नष्ट होने की दुहाई देते रहते हैं, पूंजीपतियों और नेताओं के व्यवहार पर टिप्पणी करते रहते हैं, व्यवस्था का विरोध करते रहते हैं, आम आदमी की स्थितियों- प्रस्थितियों , मज़बूरीयों का वर्णन करते हैं, लेकिन आज आम आदमी की भी संवेदना नष्ट हो गई है, वो भी दोषियों की श्रेणी में खड़ा है, तो उसे कटघरे में क्यों नहीं खड़ा करना चाहिए?
इस घटना में अगर सत्ता, व्यवस्था, पूंजीपति, अस्पताल का ऐडमिनिस्ट्रेटिव, डिपार्टमेंट जितना दोषी है उतना ही दोषी वह आम आदमी कहलाने वाला कर्मचारी भी है। और कहीं न कहीं सोशल मीडिया और बिकी हुई मिडिया भी, जिसने तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर साझा की, सबसे बड़ा असंवेदनशील व्यक्ति तो वही है, जिसने तस्वीर खींच कर पूरे हिन्दुस्तान में संप्रेषित करने की जहमत की, लेकिन उस खाना परोसते हुए कर्मचारी का हाथ नहीं पकड़ा, उसके मुँह पर तमाचा नहीं मारा। इतनी ही संवेदना थी तो पहले उस मरीज़ को प्लेट में खाना मुहैया करवाता, अस्पताल वालों ने नहीं दिया तो, वही अपने केमरा चलाने से पहले, उस मरीज़ को सम्मान पूर्वक भोजन करा देता, उसके बाद मिडिया और सोशल मीडिया की रोटियां सेकने का इंतजाम करता।
मरीज़ कितना विवश था कि, उसने विरोध नहीं किया, खाना खा लिया फर्श से ही उठाकर। उसके परिवार वाले कहाँ थे? क्या वो घर से ज़रूरी वस्तुएं मरीज़ के लिए नहीं ला सकते थे? या फिर इस घटना का दूसरा पहलू यह है कि, वो मरीज़ अकेला ही था अस्पताल में भर्ती, और उसके परिवार के सदस्य उसके साथ अस्पताल में रहने के लिए असमर्थ होंगे, किन्हीं कारणों से। कैसी - कैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है एक ग़रीब आदमी को। जिसकी ओर सत्ता का ध्यान कभी केंद्रित नहीं होता, वर्तमान सत्ता से क़ितनी उम्मीदें थीं जनता को, लेकिन क्या हुआ, सरकार ने अपने वादे पूरे किये? यह छोटी-छोटी बुनियादी ज़रूरतें तो पूरी की नहीं, और मेहंगी दँवाईयों की सब्सिडी भी ख़त्म कर दी।
बुलेट ट्रेन का ही तोहफा मिलेगा क्या इन पाँच सालों में? शिक्षा- स्वास्थ्य, बेरोजगारी, प्रदूषण, ग़रीबी जैसी समस्याओं पर वर्तमान सरकार का ध्यान क्यों नहीं जाता है? बीफ, कश्मीर, पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुद्दे मिडिया में उछलते रहते हैं, सरकार न तो ग़रीब मज़दूर के बारे में सोच रही है, और न ही दलितों- मुसलमानों, स्त्रियों के बारे में कुछ कर रही है। फिर कौन खुश हैं, संतुष्ट हैं इस सरकार से। हक़ीक़त यह है कि न कोई खुश हैं, और न ही कोई सुरक्षित हैं।
पिछले साठ सालों में कॉग्रेस ने राज किया, उसने भी इस बुनियादी ढांचे में कोई सुधार नहीं किया, और आज विपक्ष में बैठकर चिल्ला रही है। और बीजेपी पिछले साठ सालों से विपक्ष में रहकर चिल्ला रही थी, आज सत्ता में है। यह हिन्दुस्तान की बहुत बदकिस्मती है कि, उसके पास बड़े राष्ट्रीय स्तर की दो पार्टियां हैं कॉग्रेस और बीजेपी, यही सत्तापक्ष और विपक्ष में रहती हैं, और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती रहती हैं। और तीसरा विकल्प मज़बूत नहीं होता।
मेहजबीं
बुधवार, 5 अक्टूबर 2016
अज़ीज़ बर्नी का पैगाम वारिसैन तहरीक के नाम
ख़ुदा के लिए ना पढ़े वो जो इस तहरीक का हिस्सा नहीं हैं और ना बन सकते हैं क्यों कि आज का ये खत है सिर्फ उन्ही के नाम और किसी का खत पढा नही करते मुझ से वाबस्ता हर शख्स के लिए एक अच्छी खबर है कि मैं अब बिल्कुल भी बीमार नही हूं ज़ेहनी और जिस्मानी एतेबार से ठीक हूं लेकिन जाती ज़िन्दगी की तरफ से बिल्कुल भी ठीक नहीं हूं और ठीक हो पाउँगा उम्मीद भी नहीं है लिहाज़ा कम से कम वक़्क्त में अपनी ज़िंदगी का क़ौमी सरमाया, कलमी सरमाया तहरीर वो तक़रीर का सरमाया आपके सुपर्द कर जाना चाहता हूँ।
मेरी सोच मेरी फ़िक्र मेरे ग़म मेरे ज़ख्म मुझ पर जो हुए सितम जिनसे ये ज़माना है बे खबर आपके सुपर्द कर कर जाना चाहता हूं इसलिए कि मेरे बाद हक़ीक़त की संगलाख ज़मीन आप के पैरों को ज़ख्मी कर दे तो आप उनसे रिस्ते हुए खून को ना देखें बेशुमार ज़ख्मो के बावजूद क़ौम के लिए मेरे जनून को देखने और बढ़ जाएं मंज़िल क़ी तरफ अम्बिया एकराम हों या बुज़र्गाने दीन या मज़्लूमीन किसी को ज़मीन परजन्नत ना मिली ज़ुल्मो सितम मिला तकलीफों का खज़ाना मिला मगर राहे हक़ से उनके क़दम हटे नही बुरा वक़्त आता है और चला जाता है अपनी यादे और बातें छोड़ जाता है हमें फिर याद आता है बुज़र्गाने दीन अख़लाक़ ए रसूल और नबियों की ज़िंदगी जो रहनुमाई कराती है हमारी हर क़दम पर बस पैगामे क़ुरान देखने सेररते रसूल देखें मैदाने कर्बला पर बहता हुआ खून देखें इस्लाम की खिदमत के लिए उनका जनून देखें रौशनी मिलेगी दर्द का एहसास मिटेगा ज़माने के ज़ुल्मो सितम का खोफ ना रहेगा एक बार बढ़ गए ज़ो क़दम जानिबे मंज़िल तो फिर कभी न रुकेंगे।
इस वक़्त बेपनाह दर्द में डुबा हुआ है मेरा क़लम पर लफ़्ज़ों को ट्रपने की इजाज़त नही है।मेरी तहरीर क़ो सिसकने की इजाज़त नही है मुस्कुराना मेरी तहरीर के एक एक लफ्ज़ को के यही तो शहादत का जाम है जिसने लिया वो अब्दी ज़िन्दगी किया मै बहुत खुश पुरउम्मीद और मुतमईन हूँ की इतने कम वक़्त मे आपका साथ मिला फिर एक बार कुछ कर गुजरने का हौसला मिला लिहाज़ा अब मैं लफ़्ज़ों से आगे बढ़कर मैदाने अम्ल में आना चाहता हूँ कौन क्या करेगा ये बताना चाहता हूँ आप बताने की ज़िम्मेदारी क़बूल कर सकते हैं फिर इस तहरीर को आगे बढ़ाए अगर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके पास भी है और जज़्बा भी मगर कुछ जाती मज़बूरियां हैं कुछ और भी ज़िम्मेदारियाँ हैं सोचेंगे मिल बैठकर बात करेंगे दीन और दुनिया को साथ लेकर चलेंगे फ़र्ज़ के हर तक़ाज़ा को साथ लेकर चलेंगे लिहाज़ा एक बार मिलना होगा ख्वाबों ख्यालों से हटकर हकीकत से दोचार होना होगा तब बनेगा रोड मैप और तक़सीम होगी ज़िम्मेदारियाँ हम साथ हैं इससे आगे बढ़ कर तय करना होगा साथीयों अब मैं सब कुछ आपके सुपुर्द कर आपको मैदाने अम्ल मे अपने से बहुत आगे देखना चाहता हूँ यही मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कामयाबी होगी।
रविवार, 2 अक्टूबर 2016
ओपन मीडिया हाउस
अज़ीज़ बर्नी
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सोशल नेटवर्किंग साइट को मैं एक "open media hose" की शक्ल में देख रहा हूँ आज सुबह पेस बुक टीम ने 02 अक्टूबर 2012 में लिखे गए मेरे लेख को पोस्ट किया था मै रोज फेस बुक की ऐसी तमाम पोस्ट को पढ़कर अपने कुछ फेस बुक दोस्त को फाॅर्वाड करता हूँ ।आज मैं पढ़ ही रहा था कि मेरा फोन ब्लाॅक हो गया शायद किसी ने हैक्ड किया फिर कई घंटे लगे इसे सक्रिय करने में इसी लिए आज लिखने में देर हुई ।
कल मैंने इस तकरीक को जिन्दा रखने के लिए सोशल रिलेशंस शीप पर बात की थी शीर्षक था "खून के रिश्ते, जुनून के रिश्ते,सुकून के रिश्ते " मकसद था आप सब को ऐसे रिश्तों की दावत देना और इस मीडिया तारीख से जोड़ना बहुत ही अच्छा रेसपाॅनस मिला तकरीबन 100 दोस्तों ने सकारात्मक टिप्पणी किया और 150 लोगों ने पसंद किया ये मेरी शुरुआत के लिए बड़ी हौसला अफ्जा बात है।
मैं कोशिश कर रहा था कि आज की लेखनी में सबका जिक्र करूँ ये हो नही पाया इंसा अल्लाह सबसे सम्पर्क कर के शुक्रिया अदा करूँगा कुछ लोगों ने टीम मीम्बर की तरह काम करना भी शुरू कर दिया है मै उनका शुक्र गुजार हूँ ।आइये अब "ओपन मीडिया हाउस "के प्लान पर बात करते हैं कल रात देर तक मैं यू ट्यूब पर अपनी स्पीच देखता रहा काफी हैं और कई दोस्तों ने मुझे लिखा भी है कि उनके पास मेरी स्पीच हैं कुछ ने भेजी भी हैं मैं इन सबसे दरखाश्त करता हूँ इन सबको यू ट्यूब पर अपलोड कर दें ये सब आपके "ओपन मीडिया हाउस "का हिस्सा बन जाएगी जल्द ही मैं रिसर्च सेंटर में एक स्टूडियो बनाने जा रहा हूँ जहाँ से आप मुझे लाईभ बोलते हुए देख सकेंगे ।
आज मेरे दामाद शकील अहमद अपने एंटरनेट टीवी की ओपनिंग भी करने जा रहे हैं उन्हें मुबारक बाद ।शाम 6 बजे से 7 बजे तक अपने दोस्तों से बात और चैट के लिए एक्टिव रहने से भी directly interact करने का मौका मिल रहा है स्टूडियो बन जाने के बाद ये 7बजे का बात भी लाईभ होगा दोस्तों से अपील है कि मुझे गाईड करें ताकि एक ऐसा मीडिया हाउस सामने लाने मे मदद मिले।जिस वक्त मैं अजीजुल हिन्द उर्दू रोजनामा प्रकाशित कर रहा था दुनिया के 138 मुल्को में तकरीबन 40 लाख पाठक थे थोड़ा समय लग सकता है लेकिन उम्मीद इससे अधिक है ।
हम जल्द ही सभी सोशल नेटवर्किंग साइट से जोड़ देंगे इस तरह एक समाचार पत्र का एंटरनेट संस्करण सबके सामने होगा मैं जो अपने सोशल नेटवर्किंग पर दोस् तों से अनुरोध किया था आप दुनिया में जहाँ कहीं भी हैं इस तहरीक से जुड़े अभी मैं सारा प्लान सामने नही रख रहा हूँ काम जारी रहे और आहिस्ता-आहिस्ता सब सामने आता रहे लोग जुड़ते रहें इन की राय शामिल होती रहे तो इसे और बेहतर शक्ल दी जा सकेगी मुझे याद है आज के ही दिन 2 अक्टूवर 1992 में सहारा उर्दू की मैं ने शुरुआत की थी एक मासिक पत्रिका की शक्ल में कौन जानता था उस वक्त कि ये आजाद हिंदुस्तान का सबसे बड़ा उर्दू मिडिया होगा सहारा का इस्तेमाल मैंने किया या सहारा ने मेरा बहरहाल मै अपने मकशद मे कामयाब रहा कौम की तर्जुमानी में कामयाब रहा ।मेरे अदारती अवधि में प्रकाशित होने वाला मासिक पत्रिका बज़्मे सहारा दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत मासिक बना,आलमी सहारा उर्दू टीवी न्यूज़ चैनल और साप्ताहिक समाचार पत्र "रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा दिल्ली, लखनऊ गोरखपुर,मुम्बई हैदराबाद कोल्कता पटना रांची बंगलोर और कानपूर से एक साथ 21संस्करण के साथ प्रकाशित होने वाला दुनिया का सबसे बड़ा दैनिक और सभी उर्दू प्रकाशन और उर्दू न्यूज़ चैनल के साथ उर्दू का सबसे बड़ा उर्दू मिडिया हाउस था जिसका मैं सिर्फ ग्रुप एडिटर ही नही फाउंडर भी था प्लैनेर भी और exeicuter भी अगर मैं साज़िश का शिकार नही होता तो अब तक श्रीनगर भोपाल चंड़ीगढ़ जयपुर और हिंदुस्तान के बाहर जद्दाह दुबई लन्दन वाशिंगटन से भी जारी हो चूका होता सहारा श्री का वो पत्र आज भी मेरे पास है जिसमे किसी भी मुदाखलत के बिना मुझे ये दैनिक उर्दू रोज़नामा प्रकाशित करने का इख़्तेयार दिए गए थे।
अज़ीज़ुल्हिन्द की शक्ल में अपना उर्दू दैनिक प्रकाशित किया मगर कम वक्त ही जारी रह सका लेकिन उसने बहुत मक़बूलियत हासिल की सोलह पृष्ट और सभी रंगीन सबसे बड़ा उर्दू दैनिक था ओपन मिडिया हाउस के प्लानिंग के वक्त इन सब बातों के करने का मक़सद सिर्फ इतना कि शुरुआत के पीछे छिपे इस बड़े मक़सद को ज़ेहन में रखें और इस बात को रखें कि आज ही के दिन मेरे ज़रिये शुरू होने वाला ऊर्दू दैनिक उर्दू का सबसे बड़ा उर्दू मिडिया हाउस बना तो आज की ये छोटी सी शुरुआत आने वाले कल में दुनिया का सबसे बड़ा ओपन मिडिया हाउस क्यों नही हो सकता बस आपके साथ आने की देर है ये हो कर रहेगा।
अजीज बर्नी की कलम से
Aziz Bundy
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एनजीओ / मीडिया हाऊस / मुसलमान और मुस्लिम मुख़ालिफ़ ज़हनियत
एनजीओ और मीडिया हाऊस पर जो कमेन्स्, पढ़ने को मिले वो बहुत हौसला अफ़्ज़ा हैं। रोड मैप से लेकर काम करने के जज़्बे तक बहुत कुछ सामने आया। सबसे पहले मैं बुनियादी ज़रूरतें आपके सामने रख दूं फिर आज तमाम नशेबो फ़राज़ को ज़हन में रख कर मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर लंबी गुफ़्तगु होगी और मैं ये भी वाज़ेह कर दूँ कि इस वक़्त जो कुछ फेसबुक या ट्विटर पर मैं लिख रहा हूँ और अमली तौर पर जद्दोजहद कर रहा हूँ और साथ ही आप सबके जो कमेन्स् सामने आ रहे हैं। मैं इन सबको यकजा करके एक किताब की शक्ल दे रहा हूँ लिहाज़ा आप भी जब कुछ लिखें तो ये सब ज़हन में रहे कि ये तमाम बातें तारीख़ के औराक़ में दर्ज हो रही हैं वो इसलिए कि जहां भी ये काम रुक जाय उसे आगे लेकर चलने वालों के ज़हन में आज की पेशरफ़्त और लोगों के तास्सुरात, अच्छे भी बुरे भी और तमाम लोगों की काविशें इन सबका नतीजा रिकार्ड में रहे। मेरी पहली ज़रूरत 1. वेब डिज़ाइनर 2. टेक्निकल एक्सपर्ट जो मेरे राइट अप (मज़ामीन) को तर्जुमा कर के सोशल नेटवर्किंग साईट्स और बल्क एसएमएस (Bulk SMS) व ई-मेल्स पर बड़ी तादाद में सेंड(Send) कर सके। मैं जो कुछ हर रोज़ करंट अफेयर्ज़ (Current Affairs हालाते हाज़रा) पर बोल रहा हूँ उसे यू-टयूब (YouTube) पर अपलोड (Upload) कर सके। 3. कोआर्डीनेटर जो ऐसे तमाम अफ़राद से राबता क़ायम कर सके जो फेसबुक या नेट पर नहीं हैं। ऐसे 3 / 4 लोग जो अपनी ज़िंदगी को इस मिशन के लिए वक़्फ़ कर सकें। जो इन कामों को करने की भरपूर सलाहियत रखते हों और 24 घंटे मेरे साथ रह सकते हों, मैं जहां भी हूँ अपने घर पर या सफ़र में साथ रहें या अपने तमाम अख़राजात ख़ुद उठा सकते हों या क़ौम उनकी ख़िदमात के लिए उनकी और उनकी फ़ैमिली की तमाम ज़िम्मेदारियां बहुत बेहतर अंदाज़ में क़ुबूल कर सकें, तो हम 24घंटे का ऐसा लाइव मीडिया (Live media) दे सकते हैं जो अभी लोगों के तसव्वुर से बहुत दूर है। उसे शुरू करने के लिए जितनी ज़रूरी रक़म की ज़रूरत होगी यानी कैमरा, कम्प्यूटर, एडीटिंग सिस्टम, मिनी स्टूडियो, इंटरनेट वग़ैरा ये सब मैं ख़ुद करूंगा, अल्लाह का करम है उतना मैं ख़ुद कर सकता हूँ पर इससे आगे हर घर तक पहुंचाने के लिए जो भी करना पड़े वो क़ौम को करना होगा और इस मुहिम में लाखों लोगों को जुड़ना होगा। तमाम मन्फ़ी पहलूओं को सामने रखना होगा।
आज मैं कुछ बातें आपके सामने रख रहा हूँ ताकि मुख़ालिफ़ हालात के लिए आप जाने अनजाने उन लोगों को ज़िम्मेदार ना मान लें जो सीधे इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। बेशक मैं जानता हूँ उन लोगों को जो क़ौम की तर्जुमानी किसी भी मीडिया या फ़र्द के ज़रिया नहीं चाहते, ग़ैरों पर शक मत कीजिए, जिस दिन सारी हक़ीक़त सुबूतों के साथ आपके सामने रख दूंगा आप के पैरों के नीचे से ज़मीन निकल जाएगी। बेशक मुख़ालिफ़ों में ग़ैर भी शामिल हैं पर ज़्यादा ख़तरा अपनों से है। इस वक़्त इसलिए ये लिख रहा हूँ कि जो 3 / 4 लोग पूरी तरह मेरी साथ जुड़ें वो ये सोच कर जुड़ें कि हर पल जान हथेली पर लेकर चलना है। बात सिर्फ ये नहीं के 24 घंटे काम करने के बाद भी कुछ नहीं मिलना है बल्कि हर पल ख़तरे के साथ ज़हनी तनाव के साथ अपनों के दबाव के साथ जीना है, मगर भरपूर तवज्जो के साथ हर पल अपने काम (मिशन) में जुटे रहना है, यूं समझो कि सर पर कफ़न बांध कर मैदाने जंग में उतरना है, अब जंग सिर्फ़ हथियारों से नहीं लड़ी जाती। आज मीडिया जंग का बहुत बड़ा हथियार है। आप मुझे क़ौम से ऐसे सिर्फ़ 4 लोग दे दीजिए, मैं इन्शाअल्लाह बड़ी से बड़ी मुख़ालिफ़ ताक़तों को नाकाम बना कर दिखा दूंगा।
हिंदुस्तान में मुसलमानों की आबादी तक़रीबन20 करोड़ है, मुसलमानों के नुमाइंदे ज़्यादा से ज़्यादा 200 । इनमें से 100 (सौ) सियासत में, चाहे वो सेंटर में मिनिस्टर हों, स्टेट में मिनिस्टर या अपनी सियासी हैसियत की वजह से, इसी तरह तक़रीबन सौ लोग अलग अलग मुस्लिम इदारों के सरबराह, मीडिया पर्सन्स, बड़े क़द के दानिश्वर, बिज़नस मैन या दीगर नुमाइंदा अफ़राद इन तक़रीबन 200 लोगों की लिस्ट आई बी (Intelligence Bureau), सीबीआई, होम मिनिस्ट्री ग़रज़ कि हिंदुस्तान की हुकूमत, अपोज़ीशन और उन सभी पार्टियों के पास होती है जो मुसलमानों के वोट पर सियासत करते हैं। इन 200 लोगों तक मुसलमान की रेसाई बहुत कम कभी कभी या जब वो चाहते हैं तभी होती है लेकिन ऊपर जिन सबका ज़िक्र किया, ये सब अपनी अपनी ज़रूरियात या ख़्वाहिशात के हिसाब से उनके राब्ते में रहते हैं चाहे सियासी ख़्वाब पूरा करना हो, माली या अपने क़द में इज़ाफ़ा के लिए, लिहाज़ा, ये ना किसी सरकार से बिगाड़ना चाहते हैं ना दूसरी सियासी ताक़तों से, कब कौन पावर में आ जाय, कब किस की ज़रूरत पड़ जाय, हुकूमतों के लिए उन्हें ख़्वाब दिखा कर फ़ायदा पहुंचा कर या नुक़्सान से डरा कर क़ाबू में रखना, कुछ भी मुश्किल नहीं होता, यही वजह है कि मुसलमानों के साथ हिंदुस्तान में चाहे जो सुलूक हो सरकारें उनसे बेखौफ रहती हैं ये या तो चुप रहते हैं या बस इतना बोलते हैं के मुसलमानों को लगे कि हाँ आवाज़ उठाई थी और सरकार बेफ़िक्र रहे कि बस चेहरा बचाने की कोशिश है। इतना तो उन्हें करना ही चाहिए ताकि कल वोट दिलाने के काम आ सकें। उर्दू सहारा के एडिटर अज़ीज़ बर्नी का क़ुसूर ये था कि वो गुजरात में बीजेपी के ख़िलाफ़ था, महाराष्ट्र में शिवसेना के, तो बटला हाऊस और गोपालगढ़ में कांग्रेस के, कल्याण सिंह से दोस्ती की बिना पर अपने 2 2 साल पुराने दोस्त मुलायम सिंह से लड़ बैठा, दहशतगर्दी के सवाल पर आरएसएस को बेनकाब कर दिया तो मुस्लिम नुमाइंदों से उनकी ख़ामोशी पर जवाब तलब करने लगा, सहारा उर्दू की ताक़त इतनी थी कि कोई भी नज़रअंदाज करने की हिम्मत नहीं कर सकता था, यही वजह थी कि सब के लिए इस आवाज़ को ख़त्म करना ज़रूरी था। लिहाज़ा, ऐसा रास्ता निकाला जाय जो सब को सूट करता हो यानी, अज़ीज़ बर्नी तो ज़िंदा रहे और उसके क़लम की मौत हो जाय। सहारा उर्दू तो ज़िंदा रहे लेकिन तहरीक दम तोड़ जाय, सब एक साथ एक राय हों तो मुश्किल क्या, लिहाज़ा, ये हो गया, एक तवील दास्तां की हल्की सी झलक आपके सामने इसलिए कि आपकी बेपनाह मोहब्बत भरे जज़्बात को देख रहा हूँ जो हर क़ुर्बानी पर आमादा हैं करोड़ों रुपया इकट्ठा कर के क़दमों में डाल देना चाहते हैं वो पहले इस सच्चाई को समझ लें कि करोड़ों रुपया इकट्ठा करने से ज़्यादा ज़रूरी है ये सच करोड़ों लोगों तक पहुंचा देना, पैसा जमा किया जा सकता है, मीडिया हाऊस खड़ा किया जा सकता है, हिंदुस्तान में 200 से ज़्यादा उर्दू अख़बार हैं।
मेरे कई साथी अब अपने अपने अख़बार निकालते हैं, मैं 21 बरस पहले अपना अख़बार निकालता था, अगर ये तब कर सका तो आज क्या मुश्किल है। कोई मुश्किल नहीं अकेले दम भी एक उर्दू अख़बार निकाल सकता हूँ, आप पर भरोसा है। वो कामयाब भी होगा। लेकिन 21 बरस लगे सहारा उर्दू को इतनी बड़ी ताक़त बनाने में, कि क़ौम की नुमाइंदगी कर सके और 21 घंटे से कम लगे इस नुमाइंदगी को तहस नहस कर देने में, इस दरमियान सहारा इंडिया परिवार का 100 करोड़ रुपय से ज़्यादा ख़र्च हुआ, इस अख़बार को ताक़तवर बनाने में क़ौम को इसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए, मैं ख़ुद ज़िंदगी भर एहसानमंद रहूँगा, इस हक़ीक़त को सामने रख कर उगला क़दम उठाना होगा
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